आवारा नहीं, सहभागी हैं ।


आवारा नहीं, सहभागी हैं ।

आज हम हमारे आस पास विचरने वाले जीव जंतुओं की बात करेंगे जो सही मायने में अनुकूलन (adaptation) के प्रतीक हैं । वह इसलिए क्योंकि महामानव की उत्पत्ति के बाद भी आप इन्हें अपने आस पास देख पा रहे हैं, तो हुए न ये अनुकूलन के प्रतीक। आप इन्हें पालतू या आज़ाद रूप में अपने नज़दीक पाएंगे । किसी भी आज़ाद जीव जंतु को कई बार आवारा भी कहा जाता है, पर क्या हमारे आसपास रहने वाले कुत्ते, बिल्लियां, गाय, बकरी आदि सृष्टि की उत्पत्ती के समय से पालतू थे ? जिस तरह मानव अपने आरंभिक रूप से कई सदियों तक विकसित होते हुए आज के रूप में पहुंचा है, उसी तरह ये जीव भी मानव के साथ विकसित होते गए हैं । इन्हें पालतू कहा जा सकता है, यदि वे सीधे तौर पर किसी व्यक्ति की सम्पत्ती हों, पर जो खुले में विचरण कर रहे हैं, उन्हें आवारा कहना किस हद तक सही है । जब एक वयस्क मनुष्य अपने रहने और खाने का इंतज़ाम खुद करने लगता है तो वह हमारी नज़र में स्वतंत्रता का उद्घोषक माना जाता है, पर खुले में विचरण करते इन जीवों को भटका हुआ (Stray), आवारा या जंगली (Feral) कहा जाता है । मनुष्य ने अपनी ठप्पा लगाने की प्रवत्ति से इन्हें भी नही छोड़ा है, शायद यह विचार आपको विचित्र लग सकता है पर इसमे कुछ तर्क तो है ।

1963 में फ्रांसीसी लेखक पीएर्रे बॉल ने "ला प्लेनेट देस सिंगेस " ( अंग्रेज़ी अनुवाद: प्लेनेट ऑफ द एप्स ) की संरचना की थी, यह एक काल्पनिक कथा थी जिसमे वानर (गोरिल्ला, चिंपांज़ी, ओरंगुटान आदि) पृथ्वी पर अपना आधिपत्य जमा लेते हैं और मनुष्यों को अपने अधीन कर लेते हैं । इस उपन्यास पर बहुचर्चित और सफल हॉलीवुड फिल्म भी बनी थी । लेखक को इस कहानी की कल्पना पेरिस के एक चिड़ियाघर में गोरिल्ला और उसकी देख-भाल करने वाले व्यक्ति के वार्तालाप और कार्य-कलापों से मिली । ज़रा सोचिए, यदि हमारे आसपास रहने वाले जीव - कुत्ते, बंदर आदि क्रमागत उन्नति (evolution) में हमसे आगे होते और हमें उनके सामाजिक ढांचे में रहना पड़ता तो क्या होता - हमसे हमारी बौद्धिक और शारीरिक क्षमताओं के अनुसार कार्य लिया जाता, कोई माल ढोता, कोई शिकार करता तो कोई पालतू मनुष्य बन सबका दिल बहलाता। हममें से कुछ जो अपने स्वाभाविक स्वरूप में बने रहते या अपनी उपयोगिता के अभाव में स्वतंत्र छोड़ दिये जाते , वे आवारा या जंगली मनुष्य कहलाए जाते । हमें पकड़ने म्युनिसिपालिटी की गाड़ियां आतीं और हम अंधेरे कोनो की ओर भागते । रिहाइशी इलाकों के रहवासी हमे लेकर बहस करते, "आवारा मनुष्यों को क्यों खिलाते पिलाते हैं कुछ बाशिंदे, कितना डर बना रहता है इनसे । इनका कुछ भरोसा नहीं, कब नुकसान कर दें, इनकी आबादी पर रोकथाम लगाना जरूरी है, कितनी बीमारियों का घर हैं आदि " ।

यकीनन यह कपोल कल्पना के अतिरिक्त कुछ नहीं है, या शायद सच भी हो जाए - आज का मनुष्य खाध - श्रृंखला ( food chain ) के शीर्ष पर है - तेज़ दिमाग एवं आधुनिक हथियारों से लैस - ना सबसे तेज़ भागने वाला, ना सबसे वजनी, ना सबसे ऊपर पेड़ों पर चढ़ने की काबिलियत वाला, ना सबसे अच्छा तैराक और ना ही सबसे कृतज्ञ - जी हां सबसे ज़्यादा कृतज्ञ और "स्वामिभक्त" तो कुत्ता है - यह संज्ञा भी हमारी ही दी हुई है। आज जिस परिवेश में हम हैं, यहां पहुंचने में कई सदियां लगी हैं, हमारे पुरखों की सूझ-बूझ और परिस्थितियों के अनुसार ढलती, निरंतर निखरती सोच और आविष्कारों के बल पर हम मनुष्य इस पायदान पर हैं । पर क्या हम इस धरोहर को सही दिशा में ले जा रहे हैं ? आज के छोटे बड़े कार्य कलाप ही हमारा भविष्य तय करेंगे, आने वाली सदियों की इंसानी सभ्यता का नक्शा आज की पीढ़ी रच रही है, यही प्रकृति का नियम है । इसी क्रम में हमें सतत विकास (sustainable development) की दिशा में सोचना होगा ,प्राकृतिक संसाधनों के भोग की प्रवत्ति के साथ सहेजने की प्रवत्ति को समान या उच्च स्थान देना होगा । यह एक अच्छा संकेत है कि सौर ऊर्जा एवं वायू ऊर्जा का प्रयोग, जैविक खेती, वृक्षारोपण, वन्य जीव संरक्षण आदि सतत विकास के परिचायक बन रहे हैं पर इसी क्रम में हमारे आसपास रहने वाले जीवों का संज्ञान लेना भी एक ज़रूरी लक्ष्य है । यह बहुत महत्वपूर्ण है कि शहरीकरण के साथ पशु-पक्षियों के व्यवस्थापन और अधिकारों पर ध्यान दिया जाए, यह हमारी शहरी नियोजन नीति का महत्वपूर्ण अंग होना चाहिए । भारतीय नगरों में इस तरह की नीति की बात करना दूर की कौड़ी है पर विकसित देशों में यह एक महत्वपूर्ण मुद्दा है जिसपर चुनाव में हार जीत भी निर्भर करती है ।

यह एक विडंबना ही कही जाएगी कि जहां देश का एक वर्ग, विकसित देशों में मिलने वाली या उससे कई बेहतर सुविधाओं का आनंद ले रहा है, वहीं एक बड़ा वर्ग आज भी चुनाव में रोटी, कपड़ा और मकान की बात करता आया है और हर वर्ष वह खाली हाथ रह जाता है । इस प्रसंग में, जीव जंतुओं का चुनावी मुद्दा बनना फिलहाल एक अतिशयोक्ति होगी , पर एक आम, ज़िम्मेदार नागरिक होने के कारण हम सभी को सचेतन बनना होगा और हर जीव को समान दृष्टि से देखना होगा - सतत विकास में हमारे आसपास के हर जीव-जंतू को भागीदार बनाना होगा । याद रखना होगा कि हम सब जैविक उत्पत्ति और क्रमागत उन्नति की यात्रा में सहभागी हैं । होली-रंग पंचमी पर पशुओं को रंग लगाना, कांच से सुते मंझे से पतंग उड़ाना, पक्षियों के बसेरों के आसपास तेज़ आवाज़ वाले फटाके फोड़ना, आते जाते आवारा कुत्तों को एक लात जमा देना, विषाक्त भोजन दे देना आदि को रोकना होगा , इन सब पर तभी अंकुश लगेगा जब हम सचेतन होंगे । याद रखिए, आज की सोच और अभिव्यक्ति ही आने वाली सदियों की उत्पत्ति तय करेगी, अब अगले ब्लॉग पोस्ट में और चर्चा होगी इस बारे में, तब तक सचेतन रहिये, खुश रहिये ।

संकल्प बक्षी








टिप्पणियाँ

  1. बहुत बधाई और शुभकामनाएं। बहुत अच्छा लेख । वाकई पशुओं को आवारा शब्द से संबोधित करने से पहले हमें ज़रूर सोचना चाहिए । पृथ्वी जितनी हमारी है, उतनी ही उनकी भी ।प्रकृति के नियमो के साथ, शांति से वो अपना जीवन यापन कर रहे है हमे उनका सहयोग करना चाहिए और हमारे जीवन मे उनकी खूबसूरत उपस्थिति का आदर भी ।

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  2. बहुत शानदार। अलग दृष्टिकोण लेकिन सही नजरिया। चित्र भी विषय और भावनाओं को स्पष्ट करते और मार्मिक। बहुत बधाई संकल्प। इसी तरह इस श्रृंखला को बढ़ाते रहो। ढेरों शुभकामनाएं।

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  3. अच्छा लगा पढ़कर और इन मूक प्राणीयों की आवाज़ सुनकर। सही मायने में देखा जाए तो यह हमसे हमेशा कुछ न कुछ कहतें हैं, जताते हैं, प्यार करते हैं, बस हम ही इससे अनभिज्ञ हैं। हमें अर्थात मनुष्य को अपनी चेतना जगाने की आवश्यकता है।

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