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शहर में बसे गंवई लोग

शहर में बसे गंवई लोग मैं भारत के उन 30-35 प्रतिशत लोगों में से हूँ जो शहरों में रहते हैं *। वे शहर जो व्यापार, शिक्षा, चिकित्सा और वाणिज्यिक सफलता के केंद्र हैं । जहाँ अस्पतालों के बरामदों और गलियारों में मुरझाए चेहरों और मलीन पारंपरिक पोशाकें पहने गाँवों से आए लोग ईलाज होने का इंतज़ार करते बैठे-सोए दिखते हैं, ये किसी सजावटी नकली फूलों के बागीचे में भूलवश उग आए जंगली फूलों की तरह दिखते हैं । इनके पास इंतज़ार करने का धैर्य ऐसा होता है जैसे कुबेर का खज़ाना, जो कभी खत्म ही नहीं होता । इनका शहर में ही जीवन व्यापन करने वाला रिश्तेदार, इनके साथ भाग दौड़ करता व मदद करता दिखाई देता है। शहर के मध्यम और सम्भ्रांत वर्ग के लोगों का जीवन ग्रामीण परिवेश से आए गंवई लोगों के कारण सर्व सुविधा युक्त है । ये दिन रात इमारतें और सड़कें बनाते दिहाड़ी मजदूर हैं, 12 घंटे की पाली में 8 हजार प्रतिमाह पा कर भी मुस्तैदी से पहरेदारी करते सिक्युरिटी गार्ड हैं, 10-20 रुपये कमीशन पर शहरों की प्रदूषित हवा में खाना, कपड़े इत्यादि डिलीवरी करने वाले हैं, 30 रुपये रोज़ पर झाड़ू-कटका करने वाले हैं, खाना बनाने वाले हैं, आया का काम...

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