दहियल - लोकरंग में रंगा प्रणेता
दोपहर का समय है, गर्मियों का मौसम उतार पर है और बारिश अभी बादलों के गर्भ में छुपी है, हर तरफ शांति पसरी हुई है । बादल और सूरज लुकाछिपी का खेल, खेल रहे हैं । कहीं दूर से एक महीन सीटी जैसी आवाज़ कानों में पड़ रही है। उस सीटी में एक राग है, आरोह और अवरोह की सुंदरता है और बीच-बीच में खिलखिलाती चहचहाहट भी है । हम आँखे बंद कर इस सुंदर गीत को सुन रहे हैं, हमारा चित्त शांत हो गया है पर गीत के गायक को देखने की उत्सुकता ने इस तन्द्रा को तोड़ दिया है । हम खिड़की खोलते हैं और सामने के छोटे से बागीचे में उगे पुराने ठूँठ की ओर देखते हैं - उस पर बैठी एक काली-सफेद चिड़िया लगातार गा रही है । साथ ही अपनी उठी हुई पूँछ झटके के साथ ऊपर और नीचे कर रही है ।
यह एक नर दहियल/दहियर या ओरिएंटल मैगपाई रोबिन है जो शायद अपनी प्रेयसी को रिझाने की कोशिश कर रहा है । नर दहियल की पहचान है इनके ऊपरी काले शरीर पर कंधों के ऊपर दो सफैद धारियां और सफेद परों से ढका निचला भाग । नर से कुछ ही दूर पर टी.वी. केबल पर मादा भी बैठी दिखाई दी । मादा का रंग काले से हल्का, स्लेटी की तरफ है, कंधे पर हल्के सफेद निशान और निचला भाग नर की ही तरह सफेद है । वह नर से आकार में थोड़ी छोटी है । इस सुंदर जोड़े के आमोद-प्रमोद ने हमारे अपार्टमेंट ब्लॉक के सन्नाटे को खुशनुमा आवाजों से भर दिया है ।
कुछ महीनों पहले जब हम यहाँ आए तब यह बागीचा पक्षियों के कलरव से विहीन था । कुछ सफैद गले वाली मुनियाएं (सिल्वर बिल पक्षी) कभी कभार बहुत दूर से चहचहाते सुनाई देते थे । अबाबील प्रजाति के डस्की क्रेग मार्टिन दूर उड़ते, दिखते पर ये दहियल की तरह गायक नहीं बल्कि हवाई कलाबाजियों के उस्ताद होते हैं । इन पंछियों के बारे में अलग से लिखने की कोशिश रहेगी ।
अब यहाँ दहियल का यह जोड़ा रहने लगा है, शायद एक से ज़्यादा जोड़े हैं । ये पेड़ों की टहनियों , बिजली/केबल के तारों आदि पर तो बैठते ही हैं, जमीन पर भी फुदकते हुए चलते हैं । ये अपनी पूंछ को कभी सीधा ऊपर तो कभी नीचे करते रहते हैं । मार्च से जुलाई के महीने इन पक्षियों के जोड़े बनाने और प्रणय का मौसम है । इन महीनों में नर का यह सुरीला सीटी वाला गीत ज़्यादा सुनाई देता है । ये अपना घोंसला पेड़ों की कोटरों में, दीवारों और इमारतों में सुरक्षित कोनों में भी बनाते हैं । मादा घोंसला बनाने और अंडे सेने का काम करती है और नर अन्य पक्षियों से घोंसले की रक्षा करता है । इंसानों के जीवन जैसा ही कश्मकश से भरा है इनका जीवन भी । हर दिन खाना ढूंढने और खुद को ज़िंदा रखने का जतन है पर भरी दोपहरी ठूँठ पर बैठकर अपनी प्रेयसी को रिझाने का सुकून भी है ।
ये पक्षी पूरे भारतीय उपमहाद्वीप (नेपाल, बांग्लादेश, पाकिस्तान, भारत और श्रीलंका) से ले कर इंडोनेशिया, मलेशिया, सिंगापुर और चीन तक में पाए जाते हैं । ये आम तौर पर इंसानी आबादियों के आस पास बने उद्यानों, जंगलों और नदी-तालाबों के किनारों पर रहना पसंद करते हैं जहाँ इनका पसंदीदा भोजन कीड़े, कीट-पतंगे आदि बहुतायात में मिलते हैं । ये ज़रूरत पड़ने पर फल और फूल खाने में भी गुरेज़ नहीं करते हैं ।
दहियल को बंगाली में डोएल या डोएल पाखी भी कहा जाता है, यह बंगलादेश का राष्ट्रीय पक्षी है । ढाका विश्वविद्यालय के प्रोफेसर काज़ी ज़ाकिर होसैन ने इन पक्षियों की देश भर में उपलब्धता और जन मानस में लोकप्रियता के कारण इन्हें राष्ट्रीय पक्षी का दर्जा दिया । ढाका विश्वविद्यालय के एक चौराहे पर उड़ान भरते डोयल पक्षियों के जोड़े के मॉडल लगे हैं, इस चौराहे को डोयल छत्तर या डोयल चौराहा भी कहा जाता है । उड़ान भरते ये पक्षी विद्यार्थियों को मेहनत कर आकाश छू लेने की प्रेरणा देते हैं । कितनी सहज और साथ ही विस्मित कर देने वाली अनुभूति होती होगी जब बंगलादेश के नागरिक अपने राष्ट्रीय पक्षी को अपने ही मोहल्ले में रहते, उड़ते देखते होंगे ।
वही अनुभूति हम भी महसूस कर रहे थे कि हमारे पड़ोस में ही इतने लोकप्रिय पक्षियों का बसेरा है । सच मानिए इनके आने के अपार्टमेन्ट कॉम्प्लेक्स का यह कोना जीवन से भर उठा है ।
दहियल के इस गीत पर अनायास मन में ये पंक्तियां कौंध रहीं हैं -
ओ मतवाले पंछी तुम इतना सुंदर कैसे गा लेते हो,
तुम्हें घेरे हुए हैं, ईंट/सीमेंट की इमारतों के जाल,
तुम्हारे आशियाने - बागीचे के इन पेड़-पौधों पर माली की हुकूमत है,
इंसानों और वाहनों के निरंतर शोर के बीच भी तुम्हारा गाना निर्बाध जारी है,
तुम्हारा प्रेममय गीत इन कंटकों से परे है, निष्छल है, निर्विकार है,
यह हर शोर को भेदता हमारे कानों में पड़ रहा है, हमें भी शीतल कर रहा है ।
संकल्प बक्षी
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| नर दहियल |
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| मादा दहियल |





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