चुलबुली और प्यारी मैना

 चुलबुली और प्यारी मैना

आप भारत या विश्व के किसी भी कोने में रहते हों, अपने घर या आंगन में पानी का सकोरा भरकर ज़रूर रखें, यकीन मानिए यह आपको पक्षियों की आश्चर्यजनक दुनिया में ले जाएगा । आज का ब्लॉग हम इस सकोरे से ही शुरू करेंगे । गर्मियों की दोपहर है, घर की बॉलकनी में मिट्टी का सकोरा लबालब भरा है । हम घर के भीतर के कमरें में हैं कि अचानक पानी के छपछपाने की आवाज़ होती है, आदतन कैमरा उठाकर बॉलकनी की तरफ जाते हैं तो देखते हैं कि एक मैना पानी में डुबकी लगाकर, छपछप करती नहा रही है ।

मैना वही गहरे भूरे रंग, पीली चोंच, आँखों के पास पीले गोगल जैसे निशान और पीले पैरों वाली चिड़िया जिसका उल्लेख पंचतंत्र की कहानियों से लेकर कई फिल्मी गीतों में भी है । इसकी पूँछ की नोक और किनारों पर सफेद पंख हैं, प्रकृति के रंग संयोजन और चित्रकारी का वाकई कोई सानी नहीं है । हम उस मैना को कनखियों से निहारते हैं । वह पानी में के सकोरे में है और उसके कुछ साथी वहीं मुंडेर पर बैठे हैं । कुछ गौरैया और कबूतर भी आसपास हैं,  सब पानी पीने-नहाने के लिए अपनी-अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं । वह मैना अपना समय लेकर नहाना जारी रखती है, बीच-बीच में पानी पी भी लेती है, जब वह पानी की घूँट लेकर अपनी गर्दन को ऊपर की तरफ कर लेती है - तब वह बड़े-बुजुर्गों जैसी समझदार प्रतीत होती है , जिन्हें जीवन के अनुभवों से यह पता है कि पानी पीने का सही तरीका क्या है । इनके अलावा अन्य पक्षियों जैसे कौवों को भी इसी तरह से पानी पीते देखा है ।


उसके हाव भाव में सावधानी है, वह कबूतर को अपने ऊपर उड़ता देख सतर्क भाव से नहाते हुए रूक जाती है पर कुछ क्षणों बाद ही फिर अल्हड़पन से अपने स्नान को जारी रखती हैं । कुछ मिनटों बाद अपने स्नान से तृप्त हो वह अपने परों को फुला लेती है, जैसे सुखा रही हो और फिर हल्की सी आवाज़ में कुछ बोल कर उड़ जाती है । शायद वह अपनी खुशी का इज़हार करती होगी कि आज गर्मी की तपन से अच्छा छुटकारा मिला । मैंने मैनाओं या इस पक्षी की सटीक प्रजाति की तरह बोला जाए तो "आम मैनाओं" को अधिकतर 4-5 या उससे बड़े समूह में पाया है । ये साथ-साथ उड़ते हैं, जमीन पर चलते हैं और लगातार एक दूसरे से बात करते रहते हैं, ऐसा लगता है जैसे स्कूल की छुट्टी के बाद बच्चे एक साथ मस्ती करते हुए घर की ओर जा रहे हैं ।  इनकी बोली में सीटियाँ, घुड़कियाँ और महीन से लेकर मोटी आवाज़ तक शामिल है । शायद इसलिये तोते की तरह ही मैना भी इंसानी पिंजरों में कैद की जाती रही है क्योंकि ये मनुष्य की तरह बोल पाती हैं जिसे कुछ लोग मनोरंजन समझते हैं। पशु क्रूरता निवारण अधिनियम 1960 के अंतर्गत मैनाओं और अन्य घरेलू पक्षियों को कैद करना गैरकानूनी है पर इनकी अवैध बिक्री और तस्करी जारी है । 





वैसे इन पक्षियों का स्थानीय निवास एशिया महाद्वीप में  मध्य एशिया (ईरान, तुर्कमेनिस्तान आदि) से लेकर भारतीय उपमहाद्वीप,चीन,थाईलैंड,मलेशिया और सिंगापुर तक है पर इनकी उपयोगिता के कारण इन्हें सुदूर स्थानों जैसे ऑस्ट्रेलिया, न्यूजिलेण्ड, अफ्रीका, यूरोप और अमरीका आदि में बसाया गया है । अब इनकी उपयोगिता केवल मनुष्य का मन बहलाना नहीं थी, इनकी खुराक भी थी । आम मैना "एकरीडोथेरेस" परिवार की सदस्य है जो कि यूनानी शब्द "एकरीडोस" से आया है जिसका अर्थ है "टिड्डी का शिकारी"। अपने परिवार के नाम अनुरूप यह चिड़िया टिड्डियों और अन्य कीड़ों का सफाया करने में माहिर है । आप इन्हें कई दफा खेतों की जुताई के समय कीड़ों की दावत उड़ाते देख पाएंगे या किसी घास चरने वाले जानवर जैसे गाय,भैंस, घोड़े, खच्चर या हिरन की पीठ पर सवारी कर उनके शरीर पर बैठे परजीवी कीड़ों के लिए घात लगाते देखेंगे । कीड़ों के अलावा ये हर वो चीज़ खा लेती हैं जो इंसान खाते हैं फल, अनाज, मरे हुए जानवरों का माँस आदि ।

इन हरफनमौला चुलबुली चिड़ियाओं के कुछ जोड़ों को इन सुदूर देशों में कीड़ों से निजात पाने के लिए छोड़ा गया । इन्होंने अपना काम बखूबी किया पर साथ ही उन स्थानों पर अपना स्थाई बसेरा बना लिया जो कि सही भी है - "जैसा देस वैसा भेस"। ये पक्षी समूहों में रहते हैं और रहवास से लेकर खान-पान आदि के लिए इनका रवैया आक्रामक रहता है । ये इन दूसरे देशों के स्थानीय पक्षियों के घोसलों में से उनके अंडों को हटाकर अपने घोंसले बनाने लगे,इनकी तादाद तेज़ी से बढ़ने लगी और स्थानीय पक्षियों की संख्या कम होने लगी । ये कीड़ों के साथ-साथ वहाँ धान के खेतों और फलों की पैदावार को भी नुकसान पँहुचाने लगे । नतीजतन, कई देशों जैसे ऑस्ट्रेलिया आदि में सरकारों ने मैनाओं को पकड़ने, मारने और अन्य जगह बसाने पर काफी पैसा खर्च किया । आज भी वहाँ के कई स्थानों पर ये मैनाएँ अवैध शरणार्थियों की तरह रहती हुई मिलती हैं । इनकी जनसंख्या वहाँ बढ़ती जा रही है । इन्हीं कारणों से इस पक्षी को अंतरराष्ट्रीय संस्था आई.यू.सी.एन ने विश्व की सौ आक्रामक और परोपजीवी चिड़ियाओं की सूची में रखा है ।


मुझे इन्हें परोपजीवी चिन्हित करना गलत लगता है क्योंकि ये अपने स्थानीय निवास जैसे भारत में कई प्रकार की चिड़ियाओं के साथ आराम से रह रही हैं । ये शहरों, गांवो के खुले इलाकों में अन्य चिड़ियाओं जैसे गुलदुम बुलबुल, गौरैया, तैलीय मुनिया,हरिमन तोता, जंगल बैबलर और कितनी ही अन्य चिड़ियाओं के साथ सामंजस्य बनाकर रहती हैं । यहाँ ये किसानों की दोस्त है क्योंकि यह परजीवी कीड़े खाकर उनकी फसल की सुरक्षा करती हैं । यदि इनकी जिजीविषा विदेशी भूमि पर इन्हें आक्रामक बनाती है तो इसमें इनका क्या कुसूर है । ये अपनी मर्ज़ी से वहाँ नहीं गईं । 

मुझे ये चिड़ियाएँ बहुत पसंद है क्योंकि ये अपने समूह में और अन्य चिड़ियाओं से हिलमिल कर रहती हैं, अपना पूरा जीवन एक ही साथी के साथ बिताती हैं। ये अपने चुलबुलेपन से वातावरण को ऊर्जान्वित और हल्का-फुल्का बनाती हैं । आप आम (या कॉमन) मैनाओं के बारे में गूगल पर और भी जानकारी प्राप्त कर सकते हैं पर इन्हें हानिकारक या परोपजीवी कहने से पहले इनसे रूबरू जरूर मिल लीजियेगा । ये आपके निवास के आसपास ज़रूर मिल जाएंगी, बस अपने मन की खिड़की को खुला रखियेगा और "सचेतन" ब्लॉग की इस कड़ी को दोहराना मत भूलियेगा ।

संकल्प बक्षी

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