क्या हैं “सचेतन” होने के सही मायने

क्या हैं “सचेतन” होने के सही मायने “सचेतन” की यह कड़ी काफी समय बाद आ रही है । यह ब्लॉग प्रकृति और उसमें बसने वाले सभी जीवों के प्रति जागरूकता बढ़ाने का एक छोटा सा प्रयास है । प्रकृति पर केंद्रित ब्लॉग और लेख आदि लेखन के लगभग पाँच वर्षों में यह समझ बड़ी है कि पर्यावरण के प्रति “सचेतन” (“कॉन्शियस”/”जागरूक”) होने के सही मायने क्या हैं और क्या हो सकते हैं । सचेतन होने का अर्थ है अपने जीवन के और जिस पर्यावरण में हम रहते हैं उसके सभी पहलुओं, सभी जीवों, सभी अंगों के प्रति सचेत होना है । स्वयं के प्रति सचेत होते ही हम अपने आप को बेहतर समझने लगते है जिससे जीवन की कई गुत्थियां सुलझने लगती हैं । जब हम पर्यावरण के प्रति सचेत होते हैं तो सबसे पहले संयमित जीवन की ओर रूख करते हैं, यह समझ बनती है कि हमारी बढ़ती ज़रूरतें ही हमारी धरती के विध्वंस का कारण बन रही हैं । नए से पुराना और पुनर्चक्रित सामान बेहतर लगने लगता है । हम अपने साथ ही अपने आने वाली पीढ़ियों को स्वच्छ वातावरण देने के बारे में सोचने लगते हैं । सचेतन होते ही हम देश, विदेश और समाज में घटने वाली घटनाओं को पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव की कसौटी पर तोलने की कोशिश करते हैं । जब हम किसी भी विकास परियोजना, या पर्यावरण से जुड़ी मुहिम को इस कसौटी पर आंकते हैं तो पाते हैं की जो परियोजनाएं पर्यावरण के लिए हितकर हैं वे उन उनसे प्रभावित होने वाले इंसानों के लिए भी बेहतर हैं । मसलन अगर किसी नदी पर बाँध बनने से उस बाँध के जलक्षेत्र के सम्पूर्ण पर्यावरण की क्षति होती है जिसमें न केवल पेड़, पौधे, जीव जंतु नष्ट और विस्थापित होते हैं बल्कि वहाँ बसने वाले इंसानों का जीवन भी तहस-नहस हो जाता है । बाँध के जल से किसी एक क्षेत्र में कृषि के लिए जल और जलीय ऊर्जा के फायदे मिल सकते हैं पर क्या इन क्षत्रों को वैकल्पिक तरीकों से फायदा पहुंचाया जा सकता है ? क्या बाँध बनाने से पहले सरकारी अमलों ने उस क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति और जलवायु को देखते हुए कम पानी की खपत वाली फसलें जैसे जौ, रागी आदि लगाने के बारे में कोई अनुसंधान या अध्ययन किया ? क्या बाँध से नहरें बनाकर जल आपूर्ति की जगह उस क्षेत्र के पारंपरिक जल स्त्रोतों जैसे तालाबों, बावड़ियों और कूओं को पुनर्जीवित किया जा सकता है ? क्या जलीय ऊर्जा की जगह सौर और पवन ऊर्जा के बारे में सोचा जा सकता है ? क्या कृषि की जगह अन्य लघु उद्योगों को बढ़ावा दिया जा सकता है ? क्या ऐसी योजनाएँ बनाई जा सकती हैं जिनसे पर्यावरण को कम से कम नुकसान हो और साथ ही इंसानी विकास भी सतत तरीके से हो ? क्या बाँध से विस्थापित होने वाले लोगों की आजीविका और उचित मुआवज़े की व्यवस्था की गई है? जब आप अखबार की सुर्खियों में करोड़ों रुपए की लागत से शुरू होने वाली परियोजनाओं के बारें में पढ़ें तो “गूगल” पर उनके पर्यावरण पर प्रभाव के बारे में भी पढ़ें । उस परियोजना को समग्र रूप से समझें और उसके पर्यावरण पर पढ़ने वाले दुष्प्रभावों के बारे में लिखें, प्रश्न करें, चर्चा करें और जागरूकता फैलाएँ । जब आप यह सब करेंगे तो वैकल्पिक योजनाओं से जुड़े प्रश्न भी प्रमुखता में आएंगे और उन पर विचार किया जाएगा । सही मायने में “सचेतन” होना शायद यही है कि प्रकृति के एक अंग होने के मायनों को हम बेहतर तरीके से समझें और हमारा आचरण उसी तरह से हो । आशा है यह पोस्ट आपको अच्छी लगी होगी, इस वर्ष और बेहतर समझ के साथ विविध विषयों पर अपनी बात कहने की कोशिश रहेगी । संकल्प

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