बंधुआ बजरी

बंधुआ बजरी क्या आप जानते हैं कि दुनिया के तीन सर्वाधिक लोकप्रिय पालतू जीव कौन से हैं ? वे हैं कुत्ता, बिल्ली और बजरी तोता । बजरी तोता जिसके अन्य नाम हैं अंग्रेजी में बजरीगर, कैनरी तोता, जेबरा तोता, बाजी, शैल तोता, अंडुलेटेड तोता, कॉमन पेट तोता और आम भाषा में सबसे लोकप्रिय "लवबर्ड" । जी हाँ ये वही रंग-बिरंगे तोते हैं जो भारतीय हरिमन तोतों से आकार में छोटे होते हैं और भारत ही नहीं विश्वभर में पालतू जानवरों की दुकान पर आसानी से उपलब्ध हैं । ये "लवबर्ड" हैं क्योंकि ये आजीवन एक ही साथी के साथ रहते हैं व घँटों एक दूसरे के पंखों को साफ करते, सहलाते और दाना भी खिलाते हैं । जी हाँ, जब बजरी मादा अंडे से रही होती है तब नर उसे अपने मुँह में जुगाली कर भोजन खिलाता है । इनके प्रेम को देखकर विस्मित, प्रेममय या फिर इर्ष्या का भाव महसूस करना स्वाभाविक है । पर यकीन मानिए इन प्यारे पक्षियों जैसी नियति आपकी या किसी भी और जीव की नहीं होनी चाहिए । कुछ दिन पहले ही हमने पास की बिल्डिंग में एक मार्मिक दृश्य देखा, बॉलकोनी में रखे बजरी पक्षियों के पिंजरे पर एक मादा शिकरा पक्षी चोंच मार रही है । पिंजरे में बंद बजरी तोते सहमे हुए उससे दूर उड़ने की कोशिश कर रहे हैं । कुछ ही क्षणों में शिकरा पक्षी उड़ जाती है और बजरी पक्षी पिंजरे की सुरक्षा में चैन की सांस लेते हैं । इन दृश्य में भूख से व्याकुल शिकरा पक्षी है और पिंजरे में कैद बजरी पक्षियों की दबी हुई उड़ान है । शिकार और शिकार दोनों ही व्याकुल और विवश नज़र आते हैं । पिंजरे में कैद इन प्यारे लवबर्ड्स की व्यथा यह है ये सदा के लिए पिंजरे में कैद रहने के लिए अभिशप्त हैं । बाहर शिकरा जैसे शिकारी पक्षी तो हैं ही, भोजन के लिए परिस्पर्धा करने वाले गौरैया, कबूतर, फाख्ता, मुनिया, हरिमन तोते आदि जैसे कितने ही पक्षी हैं ।ऐसे में बजरी पक्षियों को स्वतंत्रता देना उन्हें मृत्युदंड देने जैसा है । भारत सहित ज़्यादातर देशों का पारिस्थितिकी तंत्र बजरी पक्षियों के अनुकूल नहीं हैं पर फिर भी ये विश्वभर के सबसे लोकप्रिय पालतू पक्षियों में से एक हैं । ये ऐसे बंधुआ पक्षी हैं जो कितनी ही पीढ़ियों से कैद में ही जीते आए हैं । यदि आप इन्हें स्वतंत्र रूप में देखना चाहते हैं तो आपको ऑस्ट्रेलिया के रूख करना पड़ेगा जहाँ इनकी बड़ी आबादी है । अपने स्वतंत्र स्वरूप में ये पक्षी समूह में रहना पसंद करते हैं । पथरीले या समतल मैदानी इलाके या घांस के मैदान इनके पसंदीदा रहवास क्षेत्र हैं । ये एक तरह के बंजारे तोते हैं जो बेहतर भोजन और पानी की तलाश में अलग-अलग स्थानों पर उड़ते रहते हैं । इनका पसंदीदा आहार घास के बीज हैं पर इन्हें गेहूँ व अन्य अनाज के दानों से भी परहेज नहीं है । सूखा पड़ने पर ये जंगलों से लेकर समुद्र तट तक भी आ जाते हैं जहाँ भोजन मिलने के बेहतर अवसर होते हैं । इनकी फलती-फूलती आबादी का कारण यह भी है कि यह किसी मस्त मलंग की तरह किसी भी पेड़ के खोल में या खम्बों से लेकर ज़मीन पर पड़े लकड़ी के कुंदों में भी अपना ठिकाना ढूंढ लेते हैं । ये खाने पीने या रहने में ज़्यादा नुक्ताचीनी नहीं करते, बस इन्हें अपने साथी और समूह की ज़रूरत होती है । ये आजीवन जोड़ा बनाते हैं और एक बार में 4 से 6 अंडे देते हैं, डेढ़ से दो महीनों में इनके चूज़े उड़ने लायक हो जाते हैं । ये अलग-अलग आवाज़ों में बोलते हैं, इंसानों की बोली भी सीख जाते हैं और आपस में मस्त रहते हैं । शायद इसीलिये तकरीबन सन 1840 से ये इंसानों के पालतू बन कर रहते आए हैं , इन्हें पालना और "मेंटेन" करना आसान है क्योंकि ये इंसानों का भोजन भी आसानी से खा लेते हैं । इन्हें पहली बार ऑस्ट्रेलिया से इंग्लैंड ले जाया गया था और वहाँ से ब्रिटिश साम्राज्य और व्यापार के फैलाव के साथ ये भी विश्वभर में ले जाए गए । इंसानों से जुड़ने के बाद इनके "बंधी प्रजनन" (कैप्टिव ब्रीडिंग) का जो सिलसिला शुरू हुआ वह आज तक जारी है । प्राकृतिक तौर पर हरे और पीले रंगों के पर वाले बजरी, आज नीले, मटमैले, सफेद और कलगी के साथ भी पाए जाते हैं, यह सब इंसानों द्वारा किये गए जैविक उत्परिवर्तन (म्यूटेशन) का नतीजा है। भारत समेत अधिकतर देशों में बजरी जैसे बहुतायत में पाए जाने वाले विदेशी पक्षियों के व्यापार और पालन पर कोई रोक नहीं है । गली-नुक्कड़ के किसी भी पालतू जीवों की दुकान पर इन्हें रखना और बेचना वैध है व इनके रख रखाव को लेकर भी कोई कड़े नियम नहीं हैं । जंगली बजरियों को कैद करना या बेचना अपराध है पर ऑस्ट्रेलिया के अतिरिक्त सभी जगह ये कैद या पालतू ही हैं । बजी, बजरी या लवबर्ड मेरी नज़र में इंसानों द्वारा शोषित अन्य कामकाजी जीवों जैसे गाय, बैल, भैंस, पालतू सूअर, बकरी और मुर्गी आदि जैसे ही हैं । फर्क बस इतना है कि ये लज़ीज़ व पोषक व्यंजनों के स्त्रोत के रुप में नहीं बल्कि एक हंसोड़, प्रेममय, मनोरंजक मगर बंधक साथी के रूप में हम इंसानों के साथ रहते आए हैं। संकल्प बक्षी

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