क्या है प्रवासी पक्षियों की सबसे बड़ी कठिनाई

 प्रवासी पक्षी - 4

क्या है प्रवासी पक्षियों की सबसे बड़ी कठिनाई

ब्लॉग की पिछली कड़ियों में हम प्रवासी पक्षियों के सफर से जुड़ी कठिनाइयों से जुड़ी कुछ बातें कर चुके हैं । इस सफर के बारे में कुछ और गहराई से सोचें तो प्रवासी पक्षियों और हम इंसानों के जीवन में कई समानताएं मिलेंगी । हम में से अधिकतर लोग अपना और अपने परिवार का भरण पोषण करने के लिये अपने जन्मस्थान से दूर जीवन व्यापन करते हैं । आजीविका कमाने के सफर पर निकलने के लिए अमूमन हम वर्षों तैयारी करते हैं और समय आने पर अपने कर्मक्षेत्र का रूख करते हैं । 

प्रवासी पक्षियों के बच्चों को इस तैयारी के लिये हमसे बहुत कम समय मिलता है, महज कुछ महीनें या हफ्ते । इनका जीवन चक्र भी हमसे काफी छोटा होता है इसलिये ये पक्षी इन हफ्तों में ही सफर पर चलने लायक ज्ञान अर्जित कर लेते हैं । यह भी महत्वपूर्ण है कि इन्हें जन्म लेते ही पता होता है कि इन्हें प्रकृति के रंगमंच पर कौनसा किरदार निभाना है । 

जब इंसान प्रवास पर निकलते हैं तो उनकी आर्थिक और सामाजिक स्थिति सफर की कठिनाई का अनुपात तय करती है । ज़्यादातर हर इंसान अपने जन्म से ही इन स्थितियों में पलता बढ़ता है और इनके हिसाब से ही आगे के सफर की योजनाएं बनाता है । इंसान अपनी मेहनत और लगन से इन परिस्थितियों को सुधार सकता है । दुर्भाग्यवश पक्षियों के पास ऐसा कोई मौका नहीं होता है । 

पक्षियों के सफर की विषमता प्राकृतिक और अप्राकृतिक कारणों पर निर्भर करती है । प्राकृतिक कारण जैसे उड़ान के दौरान तेज़ ठंडी या गर्म हवाएं, अत्यधिक बारिश और तूफान, हिमपात आदि हो सकते हैं। अप्राकृतिक कारण वे हैं जो इंसानी हस्तक्षेप से उत्पन्न होते हैं । इनमें सबसे बड़ा कारण है प्राकृतिक परिवेशों का हनन । ज़्यादातर बड़े पक्षी जैसे बतखें, गिद्ध, सारस आदि बड़े झुँड में उड़ते हैं और इनके सफर का मार्ग और पड़ाव वर्षों के अनुभव द्वारा तय होते हैं । जब इनके पड़ाव जो कि ज़्यादातर आर्द्रभूमि वाले तालाब होते हैं, इमारतों और कृषिभूमि में परिवर्तित हो जाते हैं तो ये पक्षी सफर की थकान, भूख और प्यास से अपना दम तोड़ देते हैं । इन पक्षियों को अपने सफर का मार्ग बदलने में सालों लग जाते हैं । इनकी स्थिति का अनुमान लगाइये, प्रवास पर निकलना मजबूरी है क्योंकि रहवास क्षेत्र में भीषण ठंड में जीवित रहना नामुमकिन है और प्रवास के पड़ाव पर भोजन और आराम करने की जगह नहीं है । हमारी तरह ही इन पक्षियों के दल में बच्चे, युवा, वयस्क और उम्रदराज़ पक्षी एक साथ सफर करते हैं । 


ऐसी स्थिति की कल्पना करने पर ही सिहरन सी छूटती है । इंसानों ने भी विश्व युद्धों, अकालों और कोरोना जैसी महामारियों के दौरान ऐसी स्थितियों का सामना किया है - ये घटनाएँ इंसानी इतिहास की सबसे काले दिनों की गवाह हैं। 

क्या हमारी मंशा ये नहीं होनी चाहिए कि किसी भी जीव को ऐसी परिस्थितियों से न गुज़रना पड़े?

 कई देशों ने पक्षियों के प्रवास के मार्ग पर इंसानी बसाहट रोकने के लिए नियम बनाए हैं । विभिन्न तरीकों जैसे पक्षियों की सैटेलाइट टैगिंग कर उनके सफर के बारे में बेहतर जानकारी जुटाने की कोशिश की जा रही है । फिर भी पहाड़ों, तालाबों और जंगलों पर लगातार खतरा बना हुआ है क्योंकि हम इंसानों में जागरूकता की कमी है और अपनी महत्वकांक्षा किसी भी कीमत पर पूरी करने का जुनून है । यदि हम इंसान बचपन से ही दूसरे इंसानों के प्रति ही नहीं बल्कि हर जीव (पेड़, पौधे, पशु, पक्षी आदि) के प्रति संवेदना, सहिष्णुता और आत्मीयता का भाव जागृत करें तो हम ज़रूर प्रवासी पक्षियों के सफर को आसान बना पाएंगे ।

प्राकृतिक आवास के हनन के अलावा कुछ और मानव निर्मित परेशानियों पर नज़र डालेंगे इस ब्लॉग की अगली कड़ी में । 

संकल्प

(चित्र गूगल से साभार)




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