अलविदा प्रवासी पक्षियों
अलविदा प्रवासी पक्षियों
मार्च और अप्रैल यानि प्रवासी पक्षियों के अपने प्रजनन स्थानों की ओर उड़ने का समय,उनसे अलविदा कहने का समय । गर्म इलाकों में ठंड का मौसम बिताने के बाद ये पक्षी अब अपने जन्मस्थान की ओर प्रस्थान करेंगे, प्रवास के दौरान मिली ऊर्जा और स्वस्थ वातावरण इनके इस सफर और आगे के जीवन के लिए बहुत महत्वपूर्ण है ।
प्रवासी पक्षियों के आगमन से प्रस्थान तक अखबारों में छोटे-बड़े कॉलम में प्रवासी पक्षियों की चर्चा बनी रहती है । पक्षी प्रेमियों के लिये नवम्बर से मार्च के महीने अपने मनपसंद पक्षियों को देखने और उनकी तस्वीरें लेने का अवसर प्रदान करते हैं । आज हर सक्षम व्यक्ति एक डिजिटल कैमरा या बेहतर ज़ूम वाला मोबाईल कैमरा खरीद सकता है और पक्षियों की तस्वीर लेने के शौक को पूरा कर सकता है, पर पक्षीविद या पक्षीफोटोग्राफर होने और पक्षी प्रेमी होने में बहुत फर्क है ।
प्रवासी पक्षियों के "हॉट स्पॉट" यानि इन पक्षियों की चिन्हित पसंदीदा जगहों जैसे आद्रभूमियों, तालाबों, वन्यजीव अभ्यारण्यों आदि में पक्षियों के चित्र लेने और उनसे रूबरू होने वालों की भीड़ लगी रहती है । पक्षियों के चित्र लेने का जुनून इस कदर होता है कि फोटोग्राफर बैठ कर, लेट कर, पेड़ों पर चढ़कर, कीचड़ भरे दलदल में उतरकर हर तरह से पक्षियों की झलक पाना चाहते हैं । कई बार वे ये भी नहीं देख पाते कि वे दुर्लभ पक्षियों के चित्र लेने के कारण किसी अन्य पक्षी या जीव का आशियाना तो नहीं बिगाड़ रहे । पक्षी अवलोकन और फोटोग्राफी का कोई समय भी तय नही रहता - पक्षियों के खाने/शिकार का समय हो, प्रेम आलाप का या खुद को परभक्षियों से बचाने का समय हो - हर क्षण कैमरे के ज़ूम की घर-घर और सशटर की खच-खच से ये इलाके गुंजायमान रहते हैं ।
बैंगलोर और कुछ अन्य इलाकों में तो पक्षियों के चित्र लेने की सहूलियत देने के लिए व्यवसाय तक खड़े हो गए हैं -तय मोल के एवज में ये व्यवसायी तथाकथित पक्षी प्रेमियों को पक्षियों के घोंसलों तक ले जाते हैं, कई बार तो घोंसले के आसपास की टहनियों को जबरन काटकर ये चित्र लेने को सुलभ बना देते हैं । इन्हें और चित्र लेने वालों को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि टहनियाँ कटने से घोसले परभक्षियों की नज़र में आसानी से आ जाएंगे । इस तरह का व्यवसाय वन्यजीवों को दिखाने के नाम पर भी किया जा रहा है । राजस्थान के कुछ इलाकों जैसे कुम्भलगढ़ में घूमते वक्त आपको कई टूर गाइड मिलेंगे जो तय समय पर तेंदुआ दिखाने का दावा करेंगे - इनके दावे का सच यह है कि ये तय समय और जगह पर बकरी या अन्य छोटे जानवर का चारा बना कर तेंदुए को वहाँ आकर्षित करते हैं और इस तरह तेंदुआ दिखाने की मोटी रकम वसूलते हैं। ये किस तरह का पशुप्रेम है, तेंदुए के प्राकृतिक जीवन में इस तरह का खलल बिलकुल गलत है ।
पक्षियों या किसी भी जीव के चित्र लेते वक्त या उसे देखने के दौरान यह ध्यान रखना आवश्यक है कि उस जीव की निजता, उसकी गतिविधियों और दिनचर्या में किसी भी प्रकार की बाधा न आए । इसके लिए कितने भी नियम बना लिया जाए पर अन्ततः यह चित्र लेने वाले के विवेक पर निर्भर करता है कि वो एक "ट्रॉफी हंटर" है या प्रकृति प्रेमी ।
बहरहाल प्रवासी पक्षी प्रवास के बाद उन स्थानों का रुख करते हैं जहाँ इनके जीवन का अगला पड़ाव होता है - प्रजनन और नवजातों का पालन पोषण । जब तक ये नवजात थोड़े बड़े होते हैं पुनः ठंड का मौसम आने लगता है और वे अपने माता-पिता और झुंड के अन्य पक्षियों की तरह प्रवास के सफर पर निकल पड़ते हैं । उन्हें अपनी इंद्रियों और प्रकृति के चिन्हों जैसे आकाश में तारों की दशा,सूर्य की दिशा और हवाओं के रूख को परख कर यह सफर तय करना होता है । कितना रोमांचक, जटिल और इंसानी कल्पना के परे होता होगा यह सफर ।
पक्षी प्रेमी या प्रकृति प्रेमी होना इससे नहीं साबित होता कि हम कितने प्रवासी पक्षियों के नाम जानते हैं या हमारे कैमरे से कितने पक्षियों के चित्र खींचे जा चुके हैं, यह इससे तय होता है कि हमारा बर्ताव और कर्म किसी भी पक्षी या जीव की जीवन यात्रा में बाधक न हों और हम उन पक्षियों को और उनके वातावरण को उनके मूल स्वरूप में रखने की सोच रखते हैं या नहीं ।
(चित्र गूगल से साभार)
संकल्प बक्षी


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