महासागरों को सहेजना है ज़रूरी
महासागरों को सहेजना है ज़रूरी
हर वर्ष 8 जून विश्व महासागर दिवस के रूप में मनाया जाता है, यह दिन पृथ्वी के समस्त महासागरों के संरक्षण के प्रति समर्पित है।
महासागरों के संरक्षण की बात सोचते ही मन में एक चित्र उभरता है - अथाह जलराशि जिसके सामने मनुष्य तुच्छ है, जिसकी लहरों में बड़े से बड़े जहाज़ को डुबोने की शक्ति है और जो अनंत काल से अपने भीतर अनगिनत विशाल और सूक्ष्म जीव-जंतुओं समेत कई रहस्य छिपाए हुए है । ऊपरी तौर पर इंसान इन महासमुद्रों के सामने बौना नज़र आता है पर असलियत ये है कि इन महासागरों के मूल अस्तित्व को सबसे बड़ा खतरा इंसानी गतिविधियों जैसे प्रदूषण, अत्यधिक मछली पकड़ना, समुद्र तल पर तेल और जीवाश्म ईंधन की खुदाई, सैन्य सोनार और परीक्षण आदि से ही है । आखिर महासागरों का संरक्षण क्यूँ ज़रूरी है ? जब इंसानी जीवन तो थल पर है जल में नहीं ।
इस सवाल का जवाब पृथ्वी के इतिहास में छुपा है। आज से तकरीबन 2.1 से 2.4 अरब साल पहले तक पृथ्वी का वायुमंडल कार्बन डाई ऑक्साइड, मीथेन और जल वाष्प से बना था, प्राणवायु या ऑक्सीजन के अभाव में पृथ्वी कार्बन आधारित जीवों जैसे इंसानों के अस्तित्व के लायक नहीं थी । फिर पृथ्वी के महासागरों में जलवायु उत्पन्न करने वाले साइनो बैक्टीरिया की उत्पत्ति हुई जिन्होंने प्रकाश संश्लेषण से समुद्री जल से ऑक्सीजन बनाना शुरू किया । अगले 200 से 300 लाख सालों में इतनी ऑक्सीजन बनी की पृथ्वी के वायुमंडल की संरचना बदल गई और ऑक्सीजन से सूर्य की घातक पराबैंगनी किरणों को रोकने वाली ओज़ोन परत का निर्माण हुआ । इसके बाद समुद्र में ही पृथ्वी के पहले कार्बन आधारित जीवों की उत्पत्ति हुई जिनसे मनुष्य समेत संसार के समस्त जीवों का उद्भव हुआ ।
इस ऐतिहासिक जानकारी से यह साफ है कि महासागर पृथ्वी पर जीवन बनाए रखने के लिए ज़रूरी हैं, सिर्फ महासागर नहीं स्वस्थ महासागर क्योंकि इनका मूल स्वरूप बिगड़ने के साथ ही पृथ्वी का मूल स्वरूप भी बिगडने लगा है ।वर्तमान में ये महासागर धरती की 50 प्रतिशत प्राणवायु यानी ऑक्सीजन का स्रोत हैं, समुद्री सतह पर तैरती वनस्पतियाँ जैसे प्लेंकटन, पानी में मौजूद बैक्टीरिया और समुद्र तल पर बसे पौधे और कोरल ऑक्सीजन का निर्माण करते हैं । यही प्राणवायु समुद्री जीव-जंतुओं को जीवन देती है । समुद्री पौधे और जीव-जंतु मिलकर महासागर को एक विशाल प्राकृतिक रहवास का रूप देते हैं । ये महासागर मनुष्यों के खाधपूर्ति का महत्वपूर्ण स्त्रोत हैं, विश्व भर में तकरीबन तीन अरब लोगों का भोजन समुद्र से प्राप्त मछलियाँ और अन्य जीव हैं । इसके अलावा लगभग 6000 करोड़ लोग समुद्र से मछली पकड़ने और बेचने की अर्थव्यवस्था पर निर्भर हैं ।
पर्यावरण संरक्षण में कार्यरत अग्रणी संस्था अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (आई.यू.सी.एन) के आंकड़ों के अनुसार समुद्र में प्रतिवर्ष 14 करोड़ टन प्लास्टिक कचरा डाला जा रहा है जो कि महासागरों में तैरते ढेरों का 80% है । यह प्लास्टिक के ढेर धीरे-धीरे टूटते और बिखरते हुए सूक्ष्म प्लास्टिक कणों के रुप इख्तियार कर लेते हैं । ये सूक्ष्म प्लास्टिक कण मछलियों और अन्य जलचरों के शरीर में प्रवेश कर जाते हैं । न सिर्फ ये उन निरीह जीवों को बीमार करते हैं, उनकी प्रजनन क्षमता को प्रभावित करते हैं बल्कि उन जीवों का भोजन करने वाले मनुष्यों में भी कैंसर जैसी कई बीमारियों का कारण बनते हैं । एक कहावत है कि "समुद्र कुछ भी अपने पास नहीं रखता" और यह प्लास्टिक कचरा कोई अपवाद नहीं है । समुद्री लहरों के साथ कई टन कचरा समुद्री तटों पर बहकर आ जाता है जिससे पर्यटन प्रभावित होता है ।
प्लास्टिक के अलावा महासागरों को प्रदूषित करने वाले अन्य प्रमुख स्त्रोत हैं कृषि में इस्तेमाल होने वाले कीटनाशक और रासायनिक उर्वरक जो नदियों के ज़रिये समुद्र में मिल रहे हैं, समुद्री सतहों पर बनी जैविक ईंधन जैसे पेट्रोलियम की खदानों से तेल और रसायनों का रिसाव, मालवाहक पोतों से रिसते पेट्रोलियम और अन्य रसायन, कारखानों और वाहनों आदि से उत्पन्न वायुमंडल में व्याप्त अत्याधिक कार्बन डाई ऑक्साइड जो समुद्र के पानी को अत्यंत अम्लीय बना रही है आदि। इन सभी कारकों से समुद्र का पानी ज़हरीला बन रहा है और समुद्री जीवों का जीवन प्रभावित हो रहा है । कई समुद्री जीव जैसे मैक्सिको में पाई जाने वाली वकिता, व्हेल शार्क, नीली व्हेल, ध्रुवीय भालू, राइट व्हेल, हरे समुद्री कछुए और कई जीव अत्याधिक शिकार, जल के तापमान बढ़ने और अपने प्राकृतिक आवास के उजड़ने से विलुप्त होने की कगार पर हैं ।
महासागरों के प्रदूषण के दूरगामी परिणाम जलवायु के बिगड़ने में भी दिखने लगे हैं जैसे भीषण वृष्टि, समुद्री तूफानों की तीव्रता में वृद्धि, सूखा और अकाल और मौसम में अप्रत्याशित बदलाव आदि । भले ही हम में से कई समुद्री किनारों से कोसो दूर हों पर इन समुद्र के स्वास्थ्य की बिगड़ती दशा हमें सीधे या अप्रत्यक्ष तरीके से प्रभावित करती है ।
विश्व महासागर दिवस पर यदि हर व्यक्ति प्लास्टिक का उपयोग कम करने, इसे ज़्यादा से ज़्यादा पुनः उपयोग और पुनःचक्रित करने और सबसे महत्वपूर्ण पर्यावरण संरक्षण को अपने चिंतन में रखकर पर्यावरण से सरोकार रखने वाली सरकारों का चयन करने का संकल्प ले तो शायद महासागर अपने मूल स्वरूप में रह पाएँ; नैसर्गिक,साफ सुथरे समुद्र तट और नीले-पारदर्शी अनंत जल और रहस्यों से भरे समुद्रों की स्मृतियाँ ओझल होने से बच जाएँ।
संकल्प बक्षी।


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