खुद ही बताऊंगा अपनी दास्ताँ : काजल कौआ
काला कौआ, काजल कौआ, डॉम कौआ, पुर्वजों के प्रतीक - बहुत सारे नाम, उपनाम और उपाधियाँ हैं मेरी, जो मुझे आप जैसे मनुष्यों ने दी हैं ।
मेरे बारे में जानने - समझने की उत्सुकता, मेरी बोली और संकेतों की विविधता वर्षों से जीव वैज्ञानिकों के लिए कौतुहल का विषय है । मेरी पैदाइश जंगल के एक ऊंचे वृक्ष पर हुई, लालन पालन भी वहीं - सघन वन में हुआ पर जब वन की जगह आप लोगों की बसावट के लिए बनी ऊंची इमारतों ने ले ली तब हमारा पूरा परिवार उस इमारतों के वन से दूर शहर के दूसरे कोने में आ बसा ।
यहां पेड़ कम हैं, और उस पर मेरे भाई बंधु पहले से ही उन पर डेरा डाले हुए थे , पर मैने भी उनके साथ सामंजस्य बिठा लिया और अब यहां मेरा भी परिवार रहता है । कॉमन कौए के साथ हम काजल कौए भी आप लोगों को अब खूब दिख रहे होंगे, घनी आबादी वाले इलाकों में भी । अब वन नही रहे तो यही हमारा घर है, कुछ वर्षों बाद शायद यहां भी रहना मुश्किल हो, कुछ कह नहीं सकते ।
बहरहाल यहां जैसे खाने की विविधता कहीं और नहीं, गेहूं की रोटियाँ, पुरानी ब्रेड, अंडो के छिलके, चिकन और मटन की हड्डियां और भी बहुत कुछ है । आप सब जो खाते हैं, हम लगभग सब खा लेते हैं । सब उपलब्ध भी हो जाता है, हमारी चतुराई से तो आप सब वाकिफ हैं - मटके में कंकर वाली कहानी - समझ गए होंगे । कचरे के ढेर, मांस और मछली के बाजार, और अगर खिड़की खुली हो तो आपके घर की रसोई भी हमारी पहुंच से दूर नहीं । ज़्यादा सोचिये मत, आपने यह मुसीबत स्वयं मोल ली है, पर हम पर तो थोपी गई है ।
इस रुचिकर पर अप्राकृतिक भोजन का असर भी होने लगा है, आप लोग कुछ वर्षों के अनुसंधान के बाद खुद ही पता कर लेंगे पर मैं आपको अभी से बात देता हूँ - मेरे बाबा और उनसे आगे की पीढ़ियां पूरी तरह प्रकृति से जुड़े थे - हवा की गर्माहट और दिशा से ज्ञात कर लेते थे की कब नवजातों के आगमन की तैयारी की जाए, नवजात जब संसार में आएं तब बारिश और तूफान का मौसम न हो, घोंसला कहाँ और कितनी ऊंचाई पर बनाया जाए, खान पान के सही स्रोत कौनसे हैं और बहुत सी बातें हैं जो मुझे ठीक से नहीं पता और मेरे बच्चों को भी । सब भुला सा रहा है।
हमारी प्रजाति के संघर्ष आप इंसानों जैसे बड़े नहीं, हमारी कोई पूंजी नहीं है और पूंजी अर्जित करने की लालसा या मशक्कत भी नहीं है। हमारी मशक्कत है ढूंढना, कुछ ऊंचे पेड़ों की डालियाँ, कुछ तिनके, जिनसे हम घोंसले बना सकें, एक साथी जिसके साथ हम ताउम्र ऊंची उड़ानें भरते रहें और खाने के लिए पर्याप्त भोजन, जिसका संग्रह करना हमें नही आता और न ही हम संग्रह करना चाहेंगे । इस मशक्कत के अतिरिक्त जीवन सुस्ताने और एक दूसरे की छंटाई में, संकेतों में बतियाने में,नवजातों के पोषण में और ऊंची उड़ाने भरने में निकल जाता है ।
क्या आप भी मुझ जैसे सरल जीवन की कामना रखते हैं, यदि हाँ तो शायद मैं फिर वन की ओर लौट पाऊं और जी पाऊं वही प्राकृतिक सरल जीवन । चिंता न कीजिए, आपका भी बहुत स्वागत है - बस इस सचेतना को मन में बनाए रखियेगा ।



काजल कौवे को इतना करीब से मैंने भी पहली बार आपके साथ ही देखा । उसके संघर्ष , किस तरह पेड़ की सब से ऊंची डाली पर घर का चुनाव किया गया ,कैसे बच्चो को पहले उड़ना और फिर भोजन ढूंढना सीखाया और इस व्यस्त दिनचर्या में भी कैसे सुकून के वो पल ढूंढे गए । बहुत ही बुद्धिमान ,सरल और प्यारा जीव है काजल कौवा ।आबाद रहे वो हमेशा ।
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