बोआ और बुदबुद

कहानी: बोआ और बुदबुद

बोआ एक पहाड़ी तोता है, बुदबुद भी पहाड़ी एक तोता है ।

बोआ का आशियाना फिलहाल नदी के घाट पर खड़े दरख्तों पर है, बुदबुद का घर एक फ़ीट ऊंचा और आधा फुट चौड़ा पिंजरा है, जो फलां फलां के पन्द्रहसौ वर्ग फुट वाले तीन बैडरूम के फ्लैट में है, पिंजरे के तले में अखबार और छत पर लटकन वाला झूला भी है ।

बुदबुद को खाने में बेहतरीन फलों और दानों की खिचड़ी मिलती है जो कि विदेशी कंपनी ही बनाती है, सौ रुपैये  एक दिन का खर्चा है, साथ ही कभी मिर्ची, कभी फल भी मिल जाते हैं । बोआ का झुंड रोज़ाना भोजन ढूंढता है, हर दिन एक नया संघर्ष, हर दिन खाने में कुछ नया या पुराना पर दृश्य हमेशा नया । सबसे पहले वे अपने मुखिया सीपू के नेतृत्व में फलों से लदे पेड़ों का मुआयना करते, फिर उन ठिकानों पर जाते जहां फलां फलां जैसे पक्षी प्रेमी दाना, रोटी आदि डालते । बोआ को अब पता है कि कौन से महीने में कौन सा फल उपलब्ध है - जामून, कीकर, अंजीर, जंगली बादाम,  जंगली झाड़ियों की फलियां और उसका पसंदीदा जामफल भी - वह सिर्फ चुने हुए मिश्री जैसे फल खाता है और जो नहीं भाया वो धरती के हवाले ।

बोआ के दोस्त हैं उसकी संगिनी नीपा, मुखिया सीपू, बड़ी लंबी पूंछ वाले दद्दा कुबरा और झुंड के बाकी सदस्य, साथ ही जंगली मैनाओं का वह दल जो उनके साथ नदी किनारे रहता है और खतरों से आगाह भी करता है । नदी पार रहने वाला लाल मुँह का बंदर कुल्बा भी उसका दोस्त है , दूर की ही सही दोस्ती तो है । बोआ ने कुछ अंजीर कुल्बा के लिये गिरा दिये थे, तब से हो गई दोस्ती ।बुदबुद के दोस्त हैं - फलां फलां खुद, उनके परिवार के और सदस्य, कभी कभी आने वाले रिश्तेदार, मेहमान और वो कौए और कबूतर जो बालकनी में आकर बैठते हैं , उन क्षणों को संजो लेना चाहता है बुदबुद जब वह बालकनी में उन कौए, कबूतरों और सीपू के झुंड को देखता है । एक बार जब उसने बड़े काले कौए सुग्गा को हवा में कलाबाज़ी करते देखा तो रोमांचित हो पिंजरे में चारों ओर घूम घूम कलाबाज़ी खाने लगा, फलां फलां यह देख बहुत खुश हुए,भई तोता खरीदने के पैसे जो वसूल हुए ,तब से रोज़ कुछ देर बुबबुद को बालकनी में ही रखा जाता है ।

बोआ की ज़िंदगी का सबसे रोमांचकारी क्षण था जब उसने तीन दिन लगातार उड़ान भर नदी के मुहाने पर बने चश्मे से पानी पीया था, अजीब सा जुनून सवार था उसपर, वहां जो फल खाए वैसे कहीं नहीं चखे । इसी जांबाज़ी पर मोहित होकर नीपा ने उससे जोड़ा बनाया । बुदबुद का सबसे रोमांचकारी दिन वह था जब फला फलां ने उसे कमरे में खुला छोड़ा था और वह कभी दीवार पर, पर्दे पर, मेज़ पर, कुर्सी पर और यहां तक कि जानलेवा पंखे पर भी जा बैठा, वह दिन सचमुच अलग था । अब महीने में एक आध दिन ऐसा हो जाता है ।

बोआ अब नहीं रहा, छोटी दीपावली की सुबह फलां फलां के लड़के ने मटकी में सुतली बम रखकर फोड़ दिया, ऐसा लगा जैसे बादल फटा हो, बोआ वहीं था। बुदबुद अब भी है, फलां फलां ने उसके पिंजड़े पर चादर ढाक दी है - रात जो हो गई है ।

टिप्पणियाँ

  1. आज़ादी के मायने समझाती मर्मस्पर्शी कहानी। हर प्राणी मनुष्य या जीव जंतु अपनी क्षमताओं का पूर्ण दोहन करते हुए खूब ऊंची उड़ान भरे। बहुत बधाई ।

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  2. बहुत सुंदर। इस बार इस आलेख में आपकी रचनात्मक प्रतिभा निखर कर आई है। बहुत रोचक। शुभकामनाएं। 👌💐💐

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