दर्ज़ी
दर्ज़ी ।
चियूब-चियूब , चियूब-चियूब की सी आवाज़ लगातार आपके कानों में आ रही हो, और आप विस्मित रूप से यहां -वहां, पेड़ों में या झाड़ियों में देख रहे हों - इस से हम समझ सकते हैं कि पहला: आप एक पक्षी प्रेमी या पर्यावरण प्रेमी हैं जो कि सर्वव्याप्त इंसानी शोरगुल में भी यह आवाज़ सुन पा रहे हैं - शोर आंतरिक हो या बाहरी पर हम इंसानों के जीवन में शोर की कमी नहीं है और दूसरा यह की शायद आपके नज़दीक दर्ज़ी चिड़िया मौजूद है और वह अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही है । ध्यान से देखने पर शायद आपको कोई बिल्ली, नेवला या फिर सर्प आदि भी दिखाई दे जिसे देखकर यह चिड़िया सतर्कता के स्वर छेड़ रही हो ।
जंगल बुक के रचयिता रुडयार्ड किपलिंग ने इस किताब में दर्ज़ी या टेलर चिड़िया का ज़िक्र किया है । यह छोटी सी चिड़िया - यह मानिये गोरैया से भी थोड़ी छोटी और सूर्य पक्षी से थोड़ी बड़ी - भारत और साउथ एशिया में बहुतायत से पाई जाती है । यह एक सुखद संयोग है कि इंदौर और पुणे दोनों शहरों में यह चिड़िया मुझे दिखी । मुझे लगता है कि चियूब-चियूब की आवाज़ इस नन्ही सी चिड़िया को ढूंढने का सबसे आसान तरीका है । यह चिड़िया पत्तेदार पेड़ के दो पत्तों को सिलकर उनके बीच एक झूला सा बना लेती है,और इस तरह बनता है एक सुंदर सा घोंसला (गूगल से लिया चित्र देखिए)। दोनों पत्तों को सिलने के लिए पेड़ों से मिले पतले धागे या रेशम का भी इस्तेमाल करती है । घोंसले की सिलाई में निपुणता के कारण इसे दर्ज़ी की संज्ञा दी गई है । इस आशियाने में भीतर रुई, महीन मुलायम कागज़ आदि की किनारी भी लगाई जाती है। पेड़ का पत्ता यदि बड़ा हो तो उसे ही मोड़कर सिल लिया जाता है, और अगर छोटे पत्ते हों तो दो पत्तों को जोड़कर यह मनमोहक घोंसला तैयार होता है ।
इंसान की उत्पत्ति के कई वर्षों बाद ही सिलाई या आर्किटेक्चर की कला का विकास हुआ, यह अचंभित करने वाली बात है कि उससे कई सालों पहले से ही दर्ज़ी और बया जैसी चिड़ियाएं खूबसूरत घोंसले बना रही थीं। इनकी कला के महत्व को समझिये,जब एक दर्ज़ी चिड़िया अपना घर बनाती है तो वह धूप,बारिश, धूल और हवाओं से अपनी और अपने चूजों की रक्षा करने का एकमात्र सहारा बनाती है और इसमें गलती की कोई गुंजाइश नहीं होती। यह मेरे लिये शोध का विषय है कि वह कैसे समझती है कि घोंसला अब मज़बूती से तैयार हो गया है, क्या घोंसले की लंबाई-चौड़ाई के मानक इस चिड़िया को जन्म से ही पता होते हैं या यह अपने माता-पिता या अनुभवी साथियों से यह कला सीखती है ।बहरहाल इन प्रश्नों के जवाब एक दिन ज़रूर मिलेंगे ।
यह चिड़िया हल्के हरे रंग की होती है, हरे और कुछ मटमैले रंग का मिश्रण, सर और पीठ का रंग गेरुआ होता है ,पेट और निचले हिस्से सफेद और गले पर दो काली पट्टियां भी होती हैं । सबसे उभरकर दिखने वाले चिन्ह हैं, लंबी ऊंची पूंछ जो खड़ी हुई सी दिखती है और तीखी लंबी चोंच । प्रजनन के मौसम में नर की पूंछ ज़्यादा लंबी दिखाई पड़ती है। यह मौसम मानसून के समय यानी जून से अगस्त तक अपने चरम पर होता है । नर और मादा दोनों अंडों पर बैठते हैं और तकरीबन 12 दिनों में नवजात चूजों का आगमन होता है, 14 दिनों में यह चूज़े उड़ने लायक हो जाते हैं -ये पक्षी छोटे कीड़ों को खाते हैं और नर और मादा दोनों नवजातों का लालन पोषण करते हैं । पेड़ों और ज़मीन पर ये कीड़े ढूंढते हुए देखे जा सकते हैं। बहुत कम समय में बहुत कुछ कर पाना कोई इनसे सीखे । इनके अंडो और चूजों को परभक्षियों जैसे बिल्लियां, महोक , बड़ी छिपकलियों आदि से खतरा रहता है, इसलिए शायद इनकी चेतावनी भरी आवाज़ गूंजती सुनाई देती है ।
पोस्ट में संलग्न चित्रों और साथ ही इस मनमोहक दर्ज़ी चिड़िया की आवाज़ भी आप सुन सकते हैं । अब जब भी चियूब-चियूब की आवाज़ सुनें तो इस प्यारी चिड़िया को ज़रूर याद करें जो आपके कपड़े सिलने वाले दर्ज़ी से कई वर्षों पहले से सिलाई कर रही है, खूब खुश रहें और सचेतन रहें ।
संकल्प ।
चियूब-चियूब , चियूब-चियूब की सी आवाज़ लगातार आपके कानों में आ रही हो, और आप विस्मित रूप से यहां -वहां, पेड़ों में या झाड़ियों में देख रहे हों - इस से हम समझ सकते हैं कि पहला: आप एक पक्षी प्रेमी या पर्यावरण प्रेमी हैं जो कि सर्वव्याप्त इंसानी शोरगुल में भी यह आवाज़ सुन पा रहे हैं - शोर आंतरिक हो या बाहरी पर हम इंसानों के जीवन में शोर की कमी नहीं है और दूसरा यह की शायद आपके नज़दीक दर्ज़ी चिड़िया मौजूद है और वह अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही है । ध्यान से देखने पर शायद आपको कोई बिल्ली, नेवला या फिर सर्प आदि भी दिखाई दे जिसे देखकर यह चिड़िया सतर्कता के स्वर छेड़ रही हो ।
जंगल बुक के रचयिता रुडयार्ड किपलिंग ने इस किताब में दर्ज़ी या टेलर चिड़िया का ज़िक्र किया है । यह छोटी सी चिड़िया - यह मानिये गोरैया से भी थोड़ी छोटी और सूर्य पक्षी से थोड़ी बड़ी - भारत और साउथ एशिया में बहुतायत से पाई जाती है । यह एक सुखद संयोग है कि इंदौर और पुणे दोनों शहरों में यह चिड़िया मुझे दिखी । मुझे लगता है कि चियूब-चियूब की आवाज़ इस नन्ही सी चिड़िया को ढूंढने का सबसे आसान तरीका है । यह चिड़िया पत्तेदार पेड़ के दो पत्तों को सिलकर उनके बीच एक झूला सा बना लेती है,और इस तरह बनता है एक सुंदर सा घोंसला (गूगल से लिया चित्र देखिए)। दोनों पत्तों को सिलने के लिए पेड़ों से मिले पतले धागे या रेशम का भी इस्तेमाल करती है । घोंसले की सिलाई में निपुणता के कारण इसे दर्ज़ी की संज्ञा दी गई है । इस आशियाने में भीतर रुई, महीन मुलायम कागज़ आदि की किनारी भी लगाई जाती है। पेड़ का पत्ता यदि बड़ा हो तो उसे ही मोड़कर सिल लिया जाता है, और अगर छोटे पत्ते हों तो दो पत्तों को जोड़कर यह मनमोहक घोंसला तैयार होता है ।
इंसान की उत्पत्ति के कई वर्षों बाद ही सिलाई या आर्किटेक्चर की कला का विकास हुआ, यह अचंभित करने वाली बात है कि उससे कई सालों पहले से ही दर्ज़ी और बया जैसी चिड़ियाएं खूबसूरत घोंसले बना रही थीं। इनकी कला के महत्व को समझिये,जब एक दर्ज़ी चिड़िया अपना घर बनाती है तो वह धूप,बारिश, धूल और हवाओं से अपनी और अपने चूजों की रक्षा करने का एकमात्र सहारा बनाती है और इसमें गलती की कोई गुंजाइश नहीं होती। यह मेरे लिये शोध का विषय है कि वह कैसे समझती है कि घोंसला अब मज़बूती से तैयार हो गया है, क्या घोंसले की लंबाई-चौड़ाई के मानक इस चिड़िया को जन्म से ही पता होते हैं या यह अपने माता-पिता या अनुभवी साथियों से यह कला सीखती है ।बहरहाल इन प्रश्नों के जवाब एक दिन ज़रूर मिलेंगे ।
यह चिड़िया हल्के हरे रंग की होती है, हरे और कुछ मटमैले रंग का मिश्रण, सर और पीठ का रंग गेरुआ होता है ,पेट और निचले हिस्से सफेद और गले पर दो काली पट्टियां भी होती हैं । सबसे उभरकर दिखने वाले चिन्ह हैं, लंबी ऊंची पूंछ जो खड़ी हुई सी दिखती है और तीखी लंबी चोंच । प्रजनन के मौसम में नर की पूंछ ज़्यादा लंबी दिखाई पड़ती है। यह मौसम मानसून के समय यानी जून से अगस्त तक अपने चरम पर होता है । नर और मादा दोनों अंडों पर बैठते हैं और तकरीबन 12 दिनों में नवजात चूजों का आगमन होता है, 14 दिनों में यह चूज़े उड़ने लायक हो जाते हैं -ये पक्षी छोटे कीड़ों को खाते हैं और नर और मादा दोनों नवजातों का लालन पोषण करते हैं । पेड़ों और ज़मीन पर ये कीड़े ढूंढते हुए देखे जा सकते हैं। बहुत कम समय में बहुत कुछ कर पाना कोई इनसे सीखे । इनके अंडो और चूजों को परभक्षियों जैसे बिल्लियां, महोक , बड़ी छिपकलियों आदि से खतरा रहता है, इसलिए शायद इनकी चेतावनी भरी आवाज़ गूंजती सुनाई देती है ।
पोस्ट में संलग्न चित्रों और साथ ही इस मनमोहक दर्ज़ी चिड़िया की आवाज़ भी आप सुन सकते हैं । अब जब भी चियूब-चियूब की आवाज़ सुनें तो इस प्यारी चिड़िया को ज़रूर याद करें जो आपके कपड़े सिलने वाले दर्ज़ी से कई वर्षों पहले से सिलाई कर रही है, खूब खुश रहें और सचेतन रहें ।
संकल्प ।
![]() |
| चित्र गूगल से साभार दर्ज़ी चिड़िया की आवाज़ https://drive.google.com/file/d/1MvLvMJJ13EE_5TRYnLnDWuBHQyhcSgV2/view?usp=drivesdk |














बहुत सुंदर आलेख और जानकारी। खूबसूरत चित्र भी। बहुत बधाई,शुभकामनाएं। प्रतीक्षा रहती है नई पोस्ट की।💐💐👌
जवाब देंहटाएं