आज़ादी की दौड़
कहानी: आज़ादी की दौड़
कुछ महीने भर पहले की बात है, तब कोरोना वायरस की आंच भारत पर नहीं पड़ी थी, हर सप्ताहांत की तरह उस शनिवार की सुबह हम घर की बालकॉनी में गए - तो एक नया ही दृश्य देखने को मिला । बालकॉनी के सामने खाली पड़े प्लाट में एक घोड़ा सूखी घास चर रहा था । घोड़े का रूपरंग मोहित कर देने वाला था: हल्के भूरे रंग का मजबूत शरीर, काली बड़ी आँखें, मध्यम कद-काठी, गले और पूंछ के बालों का रंग गहरा भूरा और गले में एक कपड़े की रस्सी भी बंधी थी, उम्र का सही अंदाज़ नहीं पर शायद प्रौढ़ावस्था में रहा होगा । हमने सोचा कि पालतू ही है किसी का, बारिश के दिनों में इस प्लाट पर काफी हरी घांस उग आती है और यहां बेरोक-टोक कभी चरवाहे अपनी बकरियों और भेड़ों को ले आते हैं तो कभी दूध वाले भैया अपनी गुजराती और गिर गायों को, उसी तरह शायद इस सुंदर घोड़े को भी कोई चरने छोड़ गया होगा और दिन तक ले जाएगा ।
पुणे में इस साल फरवरी अंत में ही दोपहर का पारा 33 के पास जा पहुंचा था, हमने देखा कि घोड़ा अब भी वहीं है : चार पांच घंटे बीत चुके थे और कहीं भी उसका कोई मालिक या रखवाला नहीं दिख रहा था । अब हमें थोड़ी चिंता हुई, "उसे प्यास लग गई होगी - सूखी घांस कब तक खाएगा- ये सारे विचार मन में आने लगे "। इसी चिंता के बादल हमें घोड़े के हाव भाव में भी दिखे, थोड़ा निराश और घबराया हुआ सा दिख रहा था, अब उसकी प्रौढ़ावस्था जैसे उभर कर दिख रही थी । एक बुजुर्ग जैसा दिखता बालक जो किसी अंजान - निर्जन स्थान पर अकेला छोड़ दिया गया हो ।
हमारी बिल्डिंग गली के आखिरी छोर पर है और आगे जाने का रास्ता लगभग बंद है । खाली प्लाट की पतरेनुमा दीवार में से एक पतरे को थोड़ा सा काटकर लोगों ने प्लाट के दूसरी तरफ सड़क पर जाने का एक जुगाड़ बिठा लिया है पर वहां केवल इंसान या छोटे जानवर ही जा सकते हैं, घोड़े जैसे बड़े जीव नहीं । घोड़ा रह-रह कर उस दरवाज़े पर आकर रूक जाता, मानों अपने मालिक की राह देख रहा हो ।
गली के बच्चे और कुत्ते उसकी घबराहट और बढ़ा रहे थे । जब वह प्लाट से निकलकर गली के दूसरे छोर पर जाने की कोशिश करता तो बच्चे उसे हांकना शुरू कर देते,उनसे डरकर वह फिर प्लाट में आ जाता और वहां उगे पेड़ों और झाड़ियों में पनाह लेता । जब बच्चों से पार पाकर गली के बीच स्थित एक और खाली प्लाट और गली के कचरा इकट्ठा करने की जगह तक पहुंचता तो कुत्ते उसे खदेड़ देते, जिससे फिर वह हमारे घर के सामने वाले खाली प्लाट और उसके अस्थाई निवास में आ पहुंचता और फिर वहीं पतरे के दरवाज़े के पास खड़ा हो जाता । बच्चों और कुत्तों में फर्क मात्र यह था कि एक दिल्लगी और शैतानी कर रहे थे और दूसरे भोजन और स्थान की जद्दोजहद ।
कुछ घंटों तक गली से बाहर निकलने की मशक्कत से थक हार कर उसने प्लाट के अंतिम छोर पर जंगली कीकर के बड़े पेड़ों और पतरे की दीवार की ओट में अपना शांतिपूर्ण कोना ढूंढ लिया था और अब वह वहीं खड़ा था । उस दिन रात तक वह वहीं था । अगले दिन सुबह वह फिर प्लाट में ही खाना ढूंढते हुए दिखा । हमने कुछ रोटियां और पानी की बाल्टी प्लाट के किनारे पर रख दी जो उसने कुछ देर बाद खा लीं। उस दिन कुछ पिछले दिन जैसी ही रही उसकी दिनचर्या । अब वह मन को भाने लगा था और मन ही मन हमने उस घोड़े का नाम रुस्तम रख दिया था ।
तीसरे दिन नज़ारा कुछ बदल हुआ था, रुस्तम गली के जिन कुत्तों से डर कर भागता था वह उन्ही के साथ खेलता दिखा, वह कुत्तों के पास उन्हें सूंघने जाता, वे भागते और फिर यह भी भागता उनके पीछे । इस तरह गली में यह धमाचौकड़ी चल रही थी । वह कचरा इकट्ठा करने वाली जगह पर जाकर भी अपना भोजन ढूंढने लगा था । गली के और लोगों ने भी उसके लिए पानी और खाना रखना शुरू कर दिया था । अब रुस्तम मानों इस गली का ही बाशिंदा था- एक खुला, दौड़ता, अपनी टापों की मधुर ध्वनि बिखेरता एक आज़ाद और खुश प्राणी। अब उसके गले में कपड़े नुमा लगाम गुलामी की निशानी नहीं बल्कि एक आभूषण जैसी जंच रही थी।
शायद आज़ादी की अनुभूति- भोजन, पानी और छत जैसी दूसरी मूलभूत ज़रूरतों से भी सर्वोपरि है, यह रुस्तम जानता था और रुस्तम ही क्यों हर प्राणी यह जानता है । धरती पर विचरने वाले सभी जंतुओं में सबसे श्रेष्ठ, सबसे चतुर, दुनिया के सारे संसाधनों पर जिसका एकछत्र अधिपत्य है, प्राणियों को अपने वश में कर उन्हें अजायबघरों, चिड़ियाघरों, और मछलीघरों में सजाकर आनंद लेने वाला मनुष्य भूल चुका है कि आजादी सिर्फ उसकी ही नहीं बल्कि हर एक प्राणी की मूलभूत ज़रूरत है।
रूस्तम की आंखें अब हंसती दिखाई पड़ती थी और कुछ और दिनों तक रात को उसके दौड़ लगाने की मोहक आवाज़ आती रही । फिर एक सुबह रुस्तम कहीं दिखाई नहीं दिया, रात तक भी नहीं । अगले दिन हमने सामने वाले बंगले में काम करने वाले माली अर्जुन से रुस्तम का पता पूछा तो वह बोला - "अरे वह तो पास वाली गली में चला गया है, वहां घास ज़्यादा अच्छी और घनी है"। सचमुच रुस्तम तो रुस्तम ही था, आज़ाद, ज़िंदादिल और बेखौफ़ ।
संकल्प
कुछ महीने भर पहले की बात है, तब कोरोना वायरस की आंच भारत पर नहीं पड़ी थी, हर सप्ताहांत की तरह उस शनिवार की सुबह हम घर की बालकॉनी में गए - तो एक नया ही दृश्य देखने को मिला । बालकॉनी के सामने खाली पड़े प्लाट में एक घोड़ा सूखी घास चर रहा था । घोड़े का रूपरंग मोहित कर देने वाला था: हल्के भूरे रंग का मजबूत शरीर, काली बड़ी आँखें, मध्यम कद-काठी, गले और पूंछ के बालों का रंग गहरा भूरा और गले में एक कपड़े की रस्सी भी बंधी थी, उम्र का सही अंदाज़ नहीं पर शायद प्रौढ़ावस्था में रहा होगा । हमने सोचा कि पालतू ही है किसी का, बारिश के दिनों में इस प्लाट पर काफी हरी घांस उग आती है और यहां बेरोक-टोक कभी चरवाहे अपनी बकरियों और भेड़ों को ले आते हैं तो कभी दूध वाले भैया अपनी गुजराती और गिर गायों को, उसी तरह शायद इस सुंदर घोड़े को भी कोई चरने छोड़ गया होगा और दिन तक ले जाएगा ।
पुणे में इस साल फरवरी अंत में ही दोपहर का पारा 33 के पास जा पहुंचा था, हमने देखा कि घोड़ा अब भी वहीं है : चार पांच घंटे बीत चुके थे और कहीं भी उसका कोई मालिक या रखवाला नहीं दिख रहा था । अब हमें थोड़ी चिंता हुई, "उसे प्यास लग गई होगी - सूखी घांस कब तक खाएगा- ये सारे विचार मन में आने लगे "। इसी चिंता के बादल हमें घोड़े के हाव भाव में भी दिखे, थोड़ा निराश और घबराया हुआ सा दिख रहा था, अब उसकी प्रौढ़ावस्था जैसे उभर कर दिख रही थी । एक बुजुर्ग जैसा दिखता बालक जो किसी अंजान - निर्जन स्थान पर अकेला छोड़ दिया गया हो ।
हमारी बिल्डिंग गली के आखिरी छोर पर है और आगे जाने का रास्ता लगभग बंद है । खाली प्लाट की पतरेनुमा दीवार में से एक पतरे को थोड़ा सा काटकर लोगों ने प्लाट के दूसरी तरफ सड़क पर जाने का एक जुगाड़ बिठा लिया है पर वहां केवल इंसान या छोटे जानवर ही जा सकते हैं, घोड़े जैसे बड़े जीव नहीं । घोड़ा रह-रह कर उस दरवाज़े पर आकर रूक जाता, मानों अपने मालिक की राह देख रहा हो ।
गली के बच्चे और कुत्ते उसकी घबराहट और बढ़ा रहे थे । जब वह प्लाट से निकलकर गली के दूसरे छोर पर जाने की कोशिश करता तो बच्चे उसे हांकना शुरू कर देते,उनसे डरकर वह फिर प्लाट में आ जाता और वहां उगे पेड़ों और झाड़ियों में पनाह लेता । जब बच्चों से पार पाकर गली के बीच स्थित एक और खाली प्लाट और गली के कचरा इकट्ठा करने की जगह तक पहुंचता तो कुत्ते उसे खदेड़ देते, जिससे फिर वह हमारे घर के सामने वाले खाली प्लाट और उसके अस्थाई निवास में आ पहुंचता और फिर वहीं पतरे के दरवाज़े के पास खड़ा हो जाता । बच्चों और कुत्तों में फर्क मात्र यह था कि एक दिल्लगी और शैतानी कर रहे थे और दूसरे भोजन और स्थान की जद्दोजहद ।
कुछ घंटों तक गली से बाहर निकलने की मशक्कत से थक हार कर उसने प्लाट के अंतिम छोर पर जंगली कीकर के बड़े पेड़ों और पतरे की दीवार की ओट में अपना शांतिपूर्ण कोना ढूंढ लिया था और अब वह वहीं खड़ा था । उस दिन रात तक वह वहीं था । अगले दिन सुबह वह फिर प्लाट में ही खाना ढूंढते हुए दिखा । हमने कुछ रोटियां और पानी की बाल्टी प्लाट के किनारे पर रख दी जो उसने कुछ देर बाद खा लीं। उस दिन कुछ पिछले दिन जैसी ही रही उसकी दिनचर्या । अब वह मन को भाने लगा था और मन ही मन हमने उस घोड़े का नाम रुस्तम रख दिया था ।
तीसरे दिन नज़ारा कुछ बदल हुआ था, रुस्तम गली के जिन कुत्तों से डर कर भागता था वह उन्ही के साथ खेलता दिखा, वह कुत्तों के पास उन्हें सूंघने जाता, वे भागते और फिर यह भी भागता उनके पीछे । इस तरह गली में यह धमाचौकड़ी चल रही थी । वह कचरा इकट्ठा करने वाली जगह पर जाकर भी अपना भोजन ढूंढने लगा था । गली के और लोगों ने भी उसके लिए पानी और खाना रखना शुरू कर दिया था । अब रुस्तम मानों इस गली का ही बाशिंदा था- एक खुला, दौड़ता, अपनी टापों की मधुर ध्वनि बिखेरता एक आज़ाद और खुश प्राणी। अब उसके गले में कपड़े नुमा लगाम गुलामी की निशानी नहीं बल्कि एक आभूषण जैसी जंच रही थी।
शायद आज़ादी की अनुभूति- भोजन, पानी और छत जैसी दूसरी मूलभूत ज़रूरतों से भी सर्वोपरि है, यह रुस्तम जानता था और रुस्तम ही क्यों हर प्राणी यह जानता है । धरती पर विचरने वाले सभी जंतुओं में सबसे श्रेष्ठ, सबसे चतुर, दुनिया के सारे संसाधनों पर जिसका एकछत्र अधिपत्य है, प्राणियों को अपने वश में कर उन्हें अजायबघरों, चिड़ियाघरों, और मछलीघरों में सजाकर आनंद लेने वाला मनुष्य भूल चुका है कि आजादी सिर्फ उसकी ही नहीं बल्कि हर एक प्राणी की मूलभूत ज़रूरत है।
रूस्तम की आंखें अब हंसती दिखाई पड़ती थी और कुछ और दिनों तक रात को उसके दौड़ लगाने की मोहक आवाज़ आती रही । फिर एक सुबह रुस्तम कहीं दिखाई नहीं दिया, रात तक भी नहीं । अगले दिन हमने सामने वाले बंगले में काम करने वाले माली अर्जुन से रुस्तम का पता पूछा तो वह बोला - "अरे वह तो पास वाली गली में चला गया है, वहां घास ज़्यादा अच्छी और घनी है"। सचमुच रुस्तम तो रुस्तम ही था, आज़ाद, ज़िंदादिल और बेखौफ़ ।
संकल्प


बहुत सुंदर। आपका पशु पक्षी पर्यावरण प्रेम और लेखन प्रशंसनीय है। शुभकामनाएं। लिखते रहिए।
जवाब देंहटाएंवाकई रुस्तम की चमकती आँखों और उसकी कदमताल में आज़ादी की मधुर गुंजन सुनने को मिली थी ।
जवाब देंहटाएंबहुत बधाई ��