कोरोना से संवेदना तक

कोरोना से संवेदना तक:

औसतन 0.125 माइक्रोन के आकार का कोरोना वायरस जो कि एक सामान्य रेत के कण (10 माइक्रोन) और हमारे शरीर में रक्त को बनाने वाली लाल रक्त कोशिकाओं (7 माइक्रोन) से भी कहीं महीन और छोटा है आज पुरे विश्व की सामाजिक, आर्थिक और बौद्धिक संरचना को उलट पलट कर रहा है । विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार वैश्विक स्तर पर ऐसे बदलाव द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद देखने में आए थे । 

भारत और कई दूसरे देशों में भी इस अदृश्य महामारी की रोकथाम के लिए पृथकवास (quarantine) को सबसे प्रमुख हथियार बनाया है । कुछ देशों जैसे चेक गणराज्य, नॉर्वे इत्यादि को छोड़ दें तो लगभग पूरे विश्व की इंसानी आबादी आज पृथकवास में है । ज़्यादातर जनमानस घर में ही रहकर वायरस की रोकथाम में अपना सहयोग कर रहें हैं और वहीं स्वास्थ्यकर्मी, प्रशासनिक कर्मचारी, सफाई कर्मचारी, और कितने ही सरकारी और गैर सरकारी संस्थाओं के अनाम योद्धा इस युद्ध की अग्रिम पंक्ती में संघर्ष कर रहे हैं । 

आम लोगों के लिये यह जीवनशैली एक विचित्र अनुभव है - सुबह-शाम की सैर, अपनों से मिलना जुलना, काम पर जाना, पल भर में ज़रूरी सामान की खरीदारी के लिए निकल जाना, सैर सपाटा, मॉल भ्रमण, सिनेमा आदि की कमी लगने के साथ ही कोरोना से ग्रसित होने का मानसिक दबाव और डर भी लगा रहता है । शायद यह अतिशयोक्ति हो पर अगर कोरोना काल को हटा भी दें तो भी ज़्यादातर लोग पृथकवास में ही रहते हैं - अपने आंख, कान, नाक, मूंह और दिमाग बंद कर, पहले अपना और फिर अपने परिवार का सोचने से ज़्यादा का समय और बौद्धिक चिंतन बिरलों के पास हैं और अगर है भी तो वह तार्किक दृष्टिकोण से भिन्न राजनीतिक, धार्मिक और सामाजिक प्रवत्तियों के पर्दों से छना हुआ है।  

इस स्वेछिक और स्वार्थ से उत्पन्न पृथकवास के अलावा भी हमारे संसार के कई प्राणी सदियों से पृथकवास में हैं - अपनें ही भाइयों को विद्यालय - महाविद्यालय जाते देखतीं 
 घर के काम करती बच्चियां, शादी के साथ ही अपने करियर को तिलांजलि देती विवाहिता,न्यूनतम वेतन में भी 12 घंटे की नौकरी करने वाले दरबान, भूमिहार और गरीब किसान जो शहरों में मजदूरी करने को बाध्य हैं, जातिवाद और नस्लभेद से पीड़ित कमज़ोर तब्के, आदिवासी आदि । यह सभी सदियों से पृथकवास में हैं और कोरोना ने इन्हे हाशिये पर ला खड़ा किया है । 

परन्तु इस वैश्विक पृथकवास ने हमारे मन में सहानुभूति की एक लहर ज़रूर पैदा की है, आज़ादी छिन जाने की कसक और अपने शहर और आसपास कोरोना संक्रमण से होते जनजीवन के नुकसान ने हृदय को द्रवित कर दिया है । ऐसे में यह स्वाभाविक है कि हमारा मन चिड़ियाघर में बंद आजीवन कारावास भोगते उन पशु पक्षियों के बारे में भी संवेदना महसूस करता होगा जो कई वर्षों से केवल हमारे मनोरंजन के लिये कैद हैं - इंसानों की व्यथा न्यूज़ चैनल का प्रोपोगंडा भी हो सकती हैं पर इन निरीह-निष्पाप जानवरों का दर्द एक सच्चाई सी लगती है ।

जंगल में रोज़ 50-100 मील चलने वाला हाथी - 10 फुट लंबी बेड़ी से बंधा दिखता है, लंबे ऊंचे पेड़ों पर रहने वाला लंगूर एक ठूंठ पर बैठा दिखता है और कई बार तो ठूंठ भी नसीब नहीं होता,बाड़े की सलाखों पर ही चढ़कर गुज़ारा करना पड़ता है, अपनी गर्जना से पूरे जंगल को दहला देने वाले सिंह और बाघ बाड़े के चारों ओर मानसिक रोगी जैसी अवस्था में चक्कर लगाते दिखते हैं, पक्षियों की तो पूछिये ही मत - एक ही पिजंड़े में सैकड़ों को रखा जाता है । यह सब किसलिये - ताकि इंसान अपने बच्चों के साथ वहां पिकनिक मनाने जाए, सैर सपाटा और मनोरंजन हो । 

मनोरंजन करने की इतनी बड़ी कीमत इन जीवों को क्यूं चुकानी पड़ रही है - क्या इतने विकसित होने के बावजूद भी हमें जीव जंतुओं को देखने चिड़ियाघर जाना पड़ेगा- क्या हमारी सरकारें जीव जंतुओं के थ्री-डी मॉडल बनाकर उनकी प्रदर्शनी नहीं लगा सकती - जर्मनी में वर्चुअल चिड़ियाघर का सफल प्रयोग हो चुका है । पशु अनुसंधान और संरक्षण के लिये कुछ बड़े क्षेत्रफल वाले चिड़ियाघर रखे जा सकते हैं पर वे सिर्फ अनुसंधान और संरक्षण के ही काम में लिये जाएं न कि मनोरंजन के ।    

यह लिखते हुए शर्मिंदगी महसूस होती है कि आज के युग का इंसान कोरोना से भी बड़ा वायरस है जिसने पूरी प्रकृति को भीतर तक ज़हरीला और कुंद कर दिया है- हम सब वैश्विक स्तर पर देख रहे हैं कि इंसानी गतिविधियों की कमी से प्रकृति फिर से अपना संतुलन काबिज़ कर रही है ।

बहरहाल पृथकवास खत्म होने के बाद भी कोरोना से उपजी इस संवेदना को संजोय रखें और इसे भरपूर फैलाएं - ऐसे कदम उठाएं जो भले ही छोटे हों पर सही दिशा में हों, हमेशा स्वस्थ रहें सचेतन रहें ।

संकल्प बक्षी

Onegreen.org से साभार
 

टिप्पणियाँ

  1. बहुत सुंदर,संवेदनशील और जागरूक करता आलेख। बधाई संकल्प।

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  2. उम्मीद है इस बार जब ताला बंदी खत्म हो तो कई दरवाज़े खुले सोच के , संभावनाओं के और साथ ही इन बेज़ुबानों को भी मिले आज़ादी। उसके लिए सब से पहले हमें स्वार्थ की मानसिकता से खुद को आज़ाद करना होगा । बहुत ज़रूरी लेख । बधाई

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  3. सचेतन की कड़ी में एक और सारगर्भित और विचारणीय चिंतन।

    पृथकवास इंसानों का हो चाहे जानवरों का, परेशां करने वाला तो होता ही है।

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