घटना या दुर्घटना

क्या आपको बेज़ुबानों का दर्द महसूस होता है , यकीनन होता होगा, मानवीय मूल्य हम सब में कहीं ज़िंदा हैं ऐसा मेरा विश्वास है। अखबार,टीवी न्यूज़, फेसबुक, व्हाट्सएप आदि पर जब भी हम किसी मज़लूम की परेशानी पढ़ते हैं / देखते हैं तो मन द्रवित हो जाता है और कुछ क्षण बाद ही जीवन की गाड़ी आगे बढ़ जाती है और हम उस गाड़ी में सवार हर दिन एक नए सफर पर निकल पड़ते हैं, उन हादसों और त्रासदियों को अपने मन किसी कोने में दफ़न किए। 

आज के परिपेक्ष्य में मज़लूम और बेज़ुबान हर तरफ हैं।अपने गावों की तरफ लौटते, पैदल चलते, साईकल चलाते प्रवासी श्रमिक - ये उन बायपास, हाइवे और सड़कों पर पैदल चल रहे हैं जहां आम तौर पर हम अपनी निजी गाड़ियों से जाना भी टाल देते हैं और बस, रेल या टैक्सी से जाना पसंद करते हैं क्योंकि सड़कों के सफर में दुर्घटनाओं का खतरा ज़्यादा है, यह सड़कें हर साल तकरीबन डेढ़ लाख लोगों को लील जाती हैं और करीब साढ़े चार लाख से ज़्यादा लोगों को ज़ख़्मी कर देती हैं । दुनिया भर की ग्यारह प्रतिशत सड़क दुर्घटनाए भारत में होती हैं (2018 के विश्व स्वाथ्य संघटन की सड़क सुरक्षा रिपोर्ट के अनुसार)। ये श्रमिक बेज़ुबान इसलिए हैं कि यदि इनकी आवाज़ होती तो इस तरह सड़कों पर चलने को मजबूर न होते । 

जब आप सड़कों पर धुआँधार रफ्तार से चलतें हैं तो आपको मरे-कुचले हुए पशु पक्षियों के अवशेष ज़रूर दिखते होंगे और यदि वाहन के कांच खुले हों तो उनके शवों की सड़ांध भी आप तक पहुंचती होगी, आप तुरंत कांच बंद कर लेते होंगे और सफर के दूसरे नज़ारों का मज़ा लेने लगते होंगे । ये हैं दूसरे बेज़ुबान, आपको जानकर आश्चर्य होगा कि सड़क दुर्घटनाओं से मरने वाले जीवों के आंकड़े - राज्य या केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालयों के पास भी नहीं हैं, कम से कम इनकी आधिकारिक वेबसाइट या गूगल पर तो नहीं। यदि आप ढूंढने की कोशिश भी करें तो 2019 में राज्य सभा में उठाए गए प्रश्नों और उनके उत्तरों का एक पीडीएफ मिलता है जिसमें सड़क या रेल दुर्घटनाओं में मरने वाले सिंहों, बाघों और हाथियों की संख्या पूछी गई है और उत्तर में यह संख्या बताई भी गई है पर सड़क या रेल दुर्घटनाओं में मारे जाने वाले हिरण, सियार, लोमड़ी, सर्प, नेवले, बंदरों,पक्षियों और अन्य वन्य जीवों का हिसाब नहीं है । हिसाब लगाना मुश्किल भी है क्योंकि दुर्घटना के बाद शवों की हालत काफी खराब रहती है और मुर्दाखोर जानवर (कौए, गिद्ध, सियार आदि) मृत देह का भक्षण कर लेते हैं और शायद इन्हें दर्ज करने की मंशा भी न रहती हो, क्या आपने राष्ट्रीय राजमार्ग पर किसी सरकारी गाड़ी को मृत पशुओं के शव उठाते देखा है - जब तक वे मार्ग अवरुद्ध न कर रहे हों किसी को कोई परेशानी नहीं होती- कुछ उनके ऊपर से तो कुछ बच कर निकल जाते हैं ।

वन्य जीवों की गड़ना ही नहीं है तो फिर पालतू या आम पशुओं - श्वानों, बिल्लियों, सूअरों, गिलहरियों, मेंढको, गाय-भैसों, बकरियों, मुर्गियों का क्या ? ये तो कंद मूल टमाटरों की तरह राज्य और राष्ट्रीय मार्गों पर कुचले हुए मिलते हैं । राज्य और राष्ट्रीय मार्गों पर वाहनों की गति अधिक होती है और रात भर गाड़ियां चलने से वाहन और प्राणी दुर्घटना के आसार ज़्यादा रहते हैं । परंतु हम इनसे दूर, अपने करीब के शहरों और गावों में देखें तो भी हर मोहल्ले में लंगड़ाते कुत्ते, बिल्लियां, गाएं आदि मिलेंगे - प्रमुख सड़कों पर ही नहीं, कॉलोनी के अंदर की सड़कों और इलाकों में भी । इनमें से कुछ दोस्तों को देख आप मन ही मन बुदबुदाते होंगे, 'अरे कल तक तो कालू ठीक था, आज क्यों लंगड़ा रहा है, कोई शैतान बाहर से आकर मार गया होगा' । गैर सरकारी संस्थाओं का एक बड़ा तंत्र ऐसे बेज़ुबानों के लिये कार्यरत है और निस्वार्थ भाव से इनकी सेवा कर रहा है, अगर इनकी मदद करने का आपको कोई भी मौका मिले तो चूकियेगा नहीं ।

बहरहाल, सोचने वाली बात यह है कि इतनी सड़क दुर्घटनाएं क्यों हो रही हैं - वजह बहुत सारी हैं - इंसानी बस्तियां और सड़कें पशु पक्षियों के पारंपरिक इलाकों से गुज़र रही हैं, इनके खाद्य मार्गो से होकर जा रही हैं जैसे कर्नाटक, केरल और तमिलनाडू में फैले काबिनी जंगल से राष्ट्रीय राज्यमार्ग संख्या 212 और 94 गुज़रते हैं - वाइल्ड लाइफ इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया के स्वयंसेवकों ने काबिनी से गुज़रते मार्ग के 15 किलोमीटर की सड़क पर कैमरे लगाकर 6 महीने तक वाहन दुर्घटना से मरने वाले पशु पक्षियों पर शोध किया और उनकी गड़ना की - उनकी रिपोर्ट के अनुसार सिर्फ 15 किमी की लंबाई में प्रतिदिन 2 प्राणियों की मौत होती है -भारत की सड़कों की कुल लंबाई 40 लाख किमी है, इस हिसाब से प्रतिदिन लगभाग 50,000 जीव सड़क दुर्घटनाओं की बली चढ़ते हैं यानी हर साल तकरीबन 1 करोड़ अस्सी लाख - इस मूल्यांकन में अपवाद हैं और असल संख्या थोड़ी कम हो सकती है पर यह आंकड़े इस समस्या की गंभीरता को दर्शाते हैं । इंसानी दुर्घटनाओं के शोध में पता चला कि दुर्घटनाओं का प्रमुख कारण अधिक रफ्तार है - 60% से ज़्यादा दुर्घटनाएं ज़्यादा रफ्तार के कारण संतुलन खोने से होती हैं - यही वजह शायद पशु दुर्घटना में भी लागू होती है । 

इंसान तेज़ से तेज़ रफ़्तार वाली गाड़ियों और मोटरबाइकों की इज़ात में लगा है, कम माइलेज की,भारी भरकम पेट्रोल-डीज़ल पीती मौत की सवारियां और यह चलती भी इतनी कम आवाज़ के साथ हैं कि मौत से बचने के कुछ क्षण भी नसीब नहीं होते । इन वाहनों के शौकीन बढ़ते जा रहे हैं पर इनके पहले भी दुर्घटनाएं हो रही थीं - मुद्दा सिर्फ रफ्तार का नहीं है - मुद्दा है संवेदना का - आप कितने संवेदनशील हैं सड़क पर चलते श्रमिकों को लेकर, फुटपाथ पर सोते लोगों को लेकर, नुक्कड़ पर बैठे श्वान को लेकर, सड़क सुरक्षा नियमों को लेकर - जैसे आप किसी विद्यालय या उद्यान के पास से निकलते समय गाड़ी की रफ्तार धीमी कर लेते हैं वैसे ही क्या आप कॉलोनी के मोड़ पर भी धीमी करते हैं जहां श्वानों का कुनबा रहता है/ आराम करता है, क्या आप सड़क पर घायल किसी कबूतर या कौए को देख अपनीं रफ्तार कम कर लेते हैं या मदद के लिये रुक जाते हैं, क्या आपकी गाड़ी से यदि कोई बेज़ुबान टकरा जाए तो आप उसकी मदद करने की सोचते हैं और अगली बार सावधानी बरतने का प्रण लेते हैं - अगर आप यह सोच पाते हैं तो यकीनन आप में संवेदनाओं की लौ जल रही है । 

 भारत में ही डेढ़ लाख मनुष्य और लगभग 1.8 करोड़ पशु पक्षी प्रतिवर्ष सड़क हादसों की भेंट चढ़ रहे हैं -माना कि इंसानों की दुनिया में इंसानी जान की कीमत ज़्यादा है पर फिर भी इन आंकड़ों की तुलना नहीं की जा सकती। प्रकृति की नज़र में सभी जीव एक समान है - जान चाहे किसी की भी हो उतनी ही मूल्यवान है । किसी भी जीव को दुर्घटनाग्रस्त होते देखें तो इसे मात्र एक घटना न बनने दें इसे अपने चिंतन में एक दुर्घटना ही रहने दें और इस चिंतन को सींचने दें अपनी संवेदना के वृक्ष को - इसे इतना विस्तृत होने दें कि आपके परिवार, पड़ोसी, श्वान, बिल्लियां, पक्षी और मीलों दूर सड़कों पर चलते लोग भी आपकी चेतना में हों । यह वृक्ष जितना सघन होगा उतना ही अपघात कम होगा और साथ ही कम होगा इंसान द्वारा इंसान का और प्रकृति के अन्य जीवों का विध्वंस, इसलिये जात-पात, धर्म, राजनीति से परे हो संवेदनशील रहें और एक सचेतन समाज की परिकल्पना साकार करें।

संकल्प




(चित्र इंटरनेट से साभार)




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