प्रकृति से सबक
प्रकृति से सबक
इंसान, इंसान कैसे बना ?
विचित्र प्रश्न है और इस प्रश्न के कई जवाब हो सकते हैं, इनमें से एक यह है कि इंसान की उत्पत्ति वानरों से हुई और सदियों से अपने पर्यावरण के अनुसार ढलते सीखते आज के इंसान की उत्पत्ति हुई है ।
आज का इंसान अपने पूर्वजों की तरह ही एक सामाजिक ढांचे में रहने का आदि है, इस ढांचे का प्रारूप भी सदियों से बदलता आया है । जैसे-जैसे मनुष्य नित नई बातें सीखता गया, आविष्कार करता गया, उसका सामाजिक ढांचा इन नई बातों को समाहित करता गया। यह सामाजिक ढांचा ही इंसानी जीवन की गति तय करता है और उसे नियंत्रित भी- सामाजिक ढांचे रूपी पिंजड़े की सलाखें होती हैं, धन, यश, जाति, समुदाय, कुटुंब, स्थान (शहरी, कस्बाई, ग्रामीण, विदेशी) आदि। इनसे बने दायरे में रहकर एक व्यक्ति अपने जीवन का वजूद तलाशता है और निकल पड़ता है हर रोज़ एक नए सफर पर ।
इस सफर पर मील के पत्थर सामाजिक ढांचे के अनुसार लगा दिए जाते हैं - जैसे फलां उम्र तक पढ़ना, फलां फलां वाली नौकरी और रुपयों की आमदनी, फलां उम्र तक शादी, आदि। पिंजड़े की सलाखों के अनुसार इन पत्थरों की दूरी और स्थान निर्धारित होते हैं, ज़्यादातर लोगों की पूरी ज़िंदगी इन पत्थरों को गिनने में गुज़र जाती है, कुछ बिरले समाज के लगाए पत्थरों को उखाड़ फेंकते हैं और अपने सफर की गति खुद तय करते हैं और कुछ अभागे इन पत्थरों पर अपना सर पटक पटक कर अपना जीवन समाप्त ही कर लेते हैं।
चाहे इंसान हो या अन्य प्राणी, सभी के जीवन में सामाजिक ढांचे के साथ ही, मील के पत्थरों और कंटको से भरा सफर होता है।आज का इंसान जीवन जीने के कुछ महत्वपूर्ण सबक प्रकृति से भी ले सकता है और अपने सफर को थोड़ा आसान बना सकता है। बस अपने आस पास नज़र घुमाने की देर है ऐसे कई सबक आपको बरबस दिखेंगे और महसूस होंगे।
मसलन हमारी बालकॉनी में रखा फूलों का पौधा, साल भर पानी और खाद देने के बाद भी सूखाग्रस्त और उजाड़ दिखता है पर फरवरी का महीना आते ही उसमें कलियों और खुशबूदार फूलों का आगमन होने लगता है, मार्च खत्म होते होते फिर वह अपनी कलियों से विहीन तपस्या में लीन हो जाता है । चाहे हम पूरा पीपा खाद का उड़ेल दें, फूलों की खुशबू फरवरी में ही नसीब होती है। सड़क पर लगे पेड़ पर रहती मुनिया को ले लें, जिसका घोंसला तेज़ हवा,अंधड़ और तूफान से ग्रस्त हो नष्ट हो जाता है, अगले ही दिन वह फिर घास और तिनके जमा करती, नया घोसला बनाते दिखती है । बालकॉनी में, घर के कोनों में जाले बुनती मकड़ी को देखें, आपका एक वार और जाला ध्वस्त, पर वह फिर बन जाता है कुछ ही दिनों में और भी बहुत सारे छोटे छोटे सबक आपको हर तरफ़ मिलेंगे।
जीवन की क्षणभंगुरता महसूस करनी हो तो तितलियों को देखें, कुछ दिनों का जीवन पर जीवटता की कहीं कमी नहीं - वह फूल फूल मंडराती है, मधु का स्वाद चखती है, अपने साथी की तलाश करती है पर साथ ही छिपकलियों, गिरगिटों और चिड़ियाओं का भोजन बनने का खतरा भी निरंतर उठाती है । अपनी जिजीविषा को कभी कम होता पाएं तो सफर के पत्थरों को गिनने की जगह, अपने आसपास की प्रकृति का निरीक्षण करें और आप पाएंगे की जीवन बहुत खूबसूरत है, हर परेशानी रूपी सांझ के बाद आशा का सवेरा है और हर मील का पत्थर ढोना ज़रूरी नहीं है, खूब खुश रहें , सचेतन रहें।
संकल्प







बहुत सुंदर लेख । वाकई प्रकृति हमे जीना सिखाती है। जीव जंतु हर दिन अपने लिए भोजन तलाशते हैं , ज़रूरतों पर जीते हैं संतुष्टि के साथ। नन्ही चिड़िया जो कि एक-एक तिनका जुटाकर अपना घोंसला बनाती है, इतनी व्यस्त और जोख़िम से भरे जीवन मे भी मधुर तान में गाना नहीं भूलती। वाकई जीवन का संगीत प्रकृति से ही सीखा जा सकता है ।
जवाब देंहटाएंबहुत बढ़िया लिखा। जीव जंतुओं और प्रकृति से मनुष्य बहुत कुछ सीखता है, सीखता रह सकता है। बहुत बधाई संकल्प।💐👌
जवाब देंहटाएंअपनी जिजीविषा को कभी कम होता पाएं तो सफर के पत्थरों को गिनने की जगह, अपने आसपास की प्रकृति का निरीक्षण करें और आप पाएंगे की जीवन बहुत खूबसूरत है, हर परेशानी रूपी सांझ के बाद आशा का सवेरा है और हर मील का पत्थर ढोना ज़रूरी नहीं है, खूब खुश रहें , सचेतन रहें।----वाह संकल्प जी...आनंद आ गया। बहुत दिनों बाद प्रकृति और वन्य जीवों को कोई मन से लिखने वाला मिला है...बधाई दोस्त।
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