बरसाती घास के फूल - चितकबरी मुनियाएँ
बरसाती घास के फूल - चितकबरी मुनियाएँ
बारिश का मौसम यानि सृजन का मौसम, जीवन के अंकुरण का मौसम और यदि अति हो जाए तो विध्वंस का मौसम भी । मेरे लिये यह कुछ नए तो कुछ पुराने दोस्तों की सौगात ले कर आता है । पुराने दोस्तों में सबसे पहले वह बरसाती झींगुर हैं जो शाम होते ही पंचम स्वर में टक-टक-टक की आवाज़ करने लगते हैं, यह कुछ ऐसा लगता है जैसे महाभारत काल के हस्तिनापुर में चौपड़ की बाज़ी लगी हो और शकुनि मामा पासे पीस रहे हों। पासों का यह खेल देर रात तक चलता रहता है और पौ बारह होने तक हम गहरी नींद में होते हैं। इनके अलावा धनेश (ग्रे हॉर्नबिल) और सफेद गले वाला किंगफिशर भी इस बार भी दिख रहे हैं ।
नए मित्रों की बात करें तो सबसे ज़्यादा आनंद चितकबरी मुनिया को देखने में आया। आज इनकी बात विस्तार से करेंगे । चितकबरी मुनिया, तेलिया मुनिया या सीनाबाज़ - इन्हें ऐसे कई नामों से जाना जाता है - इनका रंग गहरा भूरा होता है, पेट और सीने पर सफेद रंग पर काली चित्तियाँ होती हैं जैसे किसी रणबांकुरे का जिरह बख्तर। नर का रंग मादा से कुछ ज़्यादा गहरा होता है ।इन्हें पूरे साल मैदानों ,बागीचों और खेतों के आसपास देखा जा सकता है पर बरसात के मौसम में यह काफी ज्यादा दिखती हैं, वह इसलिये की इनका प्रमुख भोजन बीज हैं। बीजों की शौकीन होने के कारण ये चावल के खेतों में काफी दिखाई देती हैं। बरसात में हरी घास के बीजों की भरमार होने के कारण ही इनका झुंड हमारे घर के पास दिखाई दिया ।
बारिश के बाद आई गुनगुनी धूप में लंबी हरी घास पर बैठे इनके झुंड को देखना बहुत ही मनोहारी दृश्य था। हरी-हरी घास पर जैसे भूरे फूल, जैसे ही बारिश आती ये उड़ कर बबूल के पेड़ की ओट में छिप जातीं और बारिश रूकते ही फिर बीजों को चरने आ जातीं । आपने सही पढ़ा, पशुओं की तरह ये पक्षी बीजों को चरते हैं और इनके चरने के तौर तरीके शोध का विषय भी हैं। अगर आप गौर से देखें तो पाएंगे कि झुंड के सारे पक्षी एक साथ नहीं चरते, इनमें से एक या दो पक्षी ऊंची घांस या टहनियों से पहरा दे रहे होते हैं, ज़रा सी आहट हुई और सारा झुंड उड़न छू। ये काफी मधुर और धीमे संकेतों से आपस में बात करते हैं।इनकी प्यारी आवाज़ मोहित कर देती है,इसके अलावा छोटे आकार और आसान रखरखाव के कारण यह पिंजडे में भी रह पाती हैं और इसलिए इन्हें काफी संख्या में पकड़ा और अवैध तस्करी द्वारा दूसरे देशों में भेजा जाता रहा है। भारतीय उपमहाद्वीप में बहुतायात में मिलने वाली यह चिड़िया आज वेस्ट इंडीज से लेकर ऑस्ट्रेलिया तक पाई जाती है , तस्करी की बदौलत। शायद आपको तीसरी कसम में मन्ना डे द्वारा गाए प्रसिद्ध गीत "चलत मुसाफिर मोह लियो रे पिंजड़े वाली मुनिया" याद आ रहा हो । गीत काफी मधुर है पर चहकती फुदकती मुनिया को कोई कैसे पिंजड़े में रख सकता है - इसके लिए लोहे के पिंजड़े जैसा पाषाण हृदय चाहिए।
चरते समय, मधुर संकेतों में बातें करते इन्हें देख मुझे ऐसा लगा जैसे परिवार के सभी बच्चे एक साथ इकट्ठे हुए हों और गुनगुनी धूप में एक साथ हंसी ठिठोली करते हुए अपना मन पसंद चबेना खा रहे हों।असल में यह नन्ही सी चिड़ियाएं बचपन के लड़कपन से दूर अपनी ज़िम्मेदारियां भी बखूभी निभातीं हैं - घास चरने के साथ ही ये घास की पत्तियां चोंच में दबाए घोंसला बनाने में मग्न रहती हैं । जून से अगस्त इनके प्रजनन काल में आप इन्हें कई बार, घास की पत्तियां तोड़ कर अपने मुंह में दबाए उड़ते देख सकते हैं । नर और मादा, दोनों मिलकर घर बनाते हैं, इनका घोंसला छोटा सा गोलाकार गुच्छे सा दिखता है - अशोक और बबूल इनके पसंदीदा पेड़ हैं । बदकिस्मती से बरसात के शुरू होने से पहले यानी कि जून-जुलाई में, पेड़ों की कटाई-छंटाई शुरू कर दी जाती है - यह बिना विचारे की जिस टहनी या झाड़ी को काटा जा रहा है वहां किसी जीव का बसेरा तो नहीं। कैसा लगता होगा पेड़ की टहनी काटते हुए, ईश्वर होने से कम नहीं शायद - उस पर विश्वास यह की काटने से यह और अच्छी उगेगी। जिसके जीवन का खुद कुछ भरोसा नहीं वह दूसरे जीव का भविष्य कैसे तय कर सकता है, आप मुझे अवैज्ञानिक या निपट मूर्ख कहें पर पेड़ पौधों की कटाई छंटाई मेरी समझ से परे है।
मुझे यकीन है कि ज़्यादातर लोग उस डाल को कभी नहीं काटेंगे जहां चितकबरी मुनिया या किसी और पक्षी का बसेरा हो बशर्ते है कि उन्हें वह घोंसला दिखे या किसी अन्य जीव की मौजूदगी महसूस हो, क्या हम अपनी सोच समझ का छोटा सा हिस्सा इन मासूमों को दे सकते हैं? यदि हां तो फिर आप निश्चित ही अपने आसपास के मैदानों, बागीचों में इन्हें चहचहाता, उड़ता देख पाएंगे और मेरी तरह अपने बचपन की स्मृतियों को जी पाएंगे। बारिश की बौछारों की तरह अपने दिलों में ताजगी और नमीं बनाए रखें, सचेतन रहें, खुश रहें।
संकल्प









बहुत ज़रूरी मुद्दे पर आपने ध्यान आकर्षित किया । हम सभी बारिश के पहले पेड़ पौधों की छटाई करते ही हैं, तब हम यह अक्सर भूल जाते हैं कि पेड़ों की शाखाओं में ही पक्षी बारिश के पानी से अपना बचाव कर पाते हैं और इन चिड़ियाओं का तो घोंसला ही इतना छोटा होता है कि प्रायः दिखाई ही नही देता। हमें बहुत सचेत रहने की ज़रूरत है। बहुत बधाई आपको लेख के लिए 💐।
जवाब देंहटाएंBahot badhiya .. very thoughtfully written .. nice observation on birds position while they eat, collect foods and live together as family. Perfectly and patiently taken pics!!
जवाब देंहटाएंBeautiful
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