धनेश एक विलक्षण पक्षी
धनेश एक विलक्षण पक्षी
हमारे आसपास प्रकृति के कई स्वरूप हमेशा मौजूद रहते हैं, घर की चार दिवारी हो या खुला हरीतिमा से भरा वातावरण , मनुष्य कई जीव जंतुओं से घिरा रहता है - मसलन घर के कोनों में छुपी मकड़ियां या वह छिपकली जिसने दीवार घड़ी के पीछे अपना घर बना रखा होता है, बाहर निकलें तो गौरैया, कबूतर, तोते, गिलहरियां आदि अपनी व्यस्त दिनचर्या में रत दिख जाते हैं। कुछ जीवों को देखने के लिये बहुत मेहनत करनी पड़ती है, कभी वे बड़ी ही तेज़ी से आंखों के सामने से ओझल हो जाते हैं तो कभी प्रकृति के साथ इतने घुले मिले होते हैं कि उन्हें देखने के लिये अनुभूतियों का चश्मा लगाना ज़रूरी होता है, इनसे उलट कुछ जीव स्वतः अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं और जिन्हें आप चाह कर भी नजरअंदाज नहीं कर सकते, ऐसे ही पंछी हैं धनेश, जिन्हें अंग्रेज़ी में हॉर्नबिल भी कहा जाता है।
अगस्त और सितंबर के महीनों में प्रायः हर सुबह घर की बालकनी से दिखते विशाल गोंद के पेड़ पर धनेश पक्षी अपनी मनपसंद शाखाओं पर बैठे एक दूसरे से बातें करते दिखते हैं। इनकी पुकार या आवाज़ काली चील से काफी मिलती है पर उसमें एक अलग खनक सी लगती है। इन्हें सुनकर जानने का मन करता है कि ये क्या बातें कर रहे होंगे, प्रकृति की छांव में रहने वाले आदिवासियों के अलावा ज़्यादातर मनुष्य अब तक पक्षियों की बोली समझने में असमर्थ है, यह शायद इन पक्षियों के लिये अच्छा है,क्योंकि इससे इंसानी हतक्षेप की संभावनाएं कम हो जाती हैं। इससे उलट पक्षियों की ज्ञानेन्द्रियाँ इतनी विकसित हैं कि वे सहज मनुष्य की बोली समझते ही नहीं अपितु बोलने भी लगते हैं, अब क्रमागत उन्नति (एवोल्यूशन) में मनुष्य आगे हुए या पक्षी, यह समझने वाली बात है।
धनेश पक्षियों की शारीरिक संरचना जुरैसिक युग के पक्षियों के वंशज डायनासोर की याद दिलाती है, इनके शरीर का सबसे आकर्षक अंग इनकी चोंच है जो कि मुडे हुए सींग की तरह होती है, इसलिये इन्हें अंग्रेज़ी में हॉर्न(सींग)-बिल(चोंच) कहा गया है। नर धनेश की चोंच के ऊपरी हिस्से का उभार जिसे आप एक टॉप रूपी कवच भी कह सकते हैं, इन्हें मादा से भिन्न करता है। इनके गले की हड्डियां आपस में एकरूप या जुड़ी होती हैं जो इनकी भारी भरकम चोंच को संभालने के लिये उपयुक्त होती है। यह बिगुल रूपी चोंच आवास के लिये कोटर बनाने, भोजन के लिये फल गिराने और लड़ने के हथियार का काम भी करती है। ज़्यादातर धनेश प्रजातियों में चोंच के ऊपर का कवच खोखला होता है पर हेलमेटेड धनेश में यह हाथीदांत जैसे पदार्थ से भरा होता है जिससे इंसानी घरों के साजो-सामान बन सकते हैं और इसलिये यह धनेश बाज़ार की भेंट चढ़ रहा है और विलुप्त होने के कगार पर है।
धनेश पक्षी की करीब 55 प्रजातियां अफ्रीका और एशिया महाद्वीपों में मिलती हैं , जिनमें से 9 भारत में और 1श्रीलंका में पाई जाती है। इनकी कुछ प्रजातियाँ केवल जंगलों में पाई जाती हैं और कुछ खेतों और बागानों के इर्दगिर्द। इन प्रजातियों के बारे में आप और विस्तृत रूप में विकिपीडिया पर पढ़ सकते हैं। भारत में सबसे अधिक क्षेत्रों में भारतीय सलेटी धनेश (इंडियन ग्रे हॉर्नबिल) पाया जाता है और यही हमें पुणे के शहरी वातावरण में दिखा। इन पक्षियों का प्रमुख आहार फल और छोटे जीव-जंतु आदि हैं, शहरों के इर्दगिर्द लगे फलों के पेड़ जैसे करोंदा, अशोक, गोंद और कनेर आदि इन्हें अपनी ओर आकर्षित करते हैं। कनेर के फल जो बाके पक्षियों और इंसान के लिए जहरीले हैं, उन्हें यह चाव से खाते हैं।
भारतीय सलेटी धनेश, नाम के अनुरूप ही सलेटी रंग के होते हैं, इनकी लंबी पूंछ इन्हें टहनियों पर संतुलन बनाने और उड़ने में मदद करती है, इनकी उड़ान काफी सधी हुई होती है मानो आकाश एक बड़ी बर्फ की चादर है और ये मनमोहक पक्षी उसपर फिसल रहे हों, इस सम्ममोहक उड़ान को देखकर यकीनन परीकथाओं में उड़ने वाले जादुई पक्षियों सी अनुभूति होती है। इनकी प्रजनन यात्रा भी काफी दिलचस्प है, ये पेड़ों की कोटरों में घर बनाते हैं, मादा कोटर में 1 से 5 तक अंडे देती है, वह कोटर का मुहाना अपने मल और मिट्टी के ढेलों से बंद कर देती है, उतना ही भाग खुला रहता है जहां से नर खाना पंहुचा सके। सबसे दिलचस्प बात यह है कि जब मादा अंडे से रही होती है, तब वह अपने पर भी झड़ा रही होती है। अंडों से चूज़े निकल कर जब तक थोड़े बड़े होते हैं, तब तक मादा के नए पर आ जाते हैं और फिर वह कोटर की मल-मिट्टी से निर्मित दीवार को तोड़कर बाहर उड़ जाती है। इसके बाद नर और मादा दोनों चूजों की देखभाल करते हैं। ऐसा माना जाता है कि कोटर के अंधेरे से पर झड़ने की प्रक्रिया शुरू होती है। जहां इंसानी समाज में आज भी मादाओं के पर कतर दिये जाते हैं, वहां प्रकृति ने इन मनमोहक प्राणियों को जीवन के हर पड़ाव पर एक दूसरे को सम्बल देने और उड़ने के समान अवसरों से नवाज़ा है।
इस साल धनेश को फिर देख पाना एक सुखद अनुभव था, यह इनकी इनायत है कि ये अब भी इंसानी बस्तियों के आस पास आते हैं, कहीं इन्हे इनके मांस के लिये पकड़ा जाता है तो कहीं इनके आवासीय जंगलों की कटाई कर इमारतें खड़ी कर दी जाती हैं। अब यह प्रत्यक्ष रूप से दिखने लगा है कि धनेश और इनके जैसे कितने ही पक्षियों को देखने भर का सुयोग हमें तभी मिलेगा जब हम सुधरेंगे और अपने आसपास के पर्यावरण को इनके अनुरूप बना पाएंगे।
संकल्प बक्षी
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| भारतीय सलेटी धनेश (मादा) |
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| भारतीय सलेटी धनेश (नर) चित्र विलिपेडिया से साभार |
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| हेलमेटेड धनेश (नर) चित्र विकिपीडिया से साभार |







बहुत बधाई 💐
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