एक अनूठा अदाकार - मछरिया (व्हाइट स्पॉटेड फैंटेल)
एक अनूठा अदाकार - मछरिया (व्हाइट स्पॉटेड फैंटेल)
क्या आपने कभी सोचा है कि इंसानों के संगीत की तरह ही चिड़ियाओं के गायन की भी विभिन्न शैलियां हैं , जैसे मनुष्यों के शास्त्रीय संगीत के विभिन्न घरानों में गुरू शिष्य परंपरा के अनुसार घराने की संगीत शैली की बारीकियां एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पंहुचती हैं उसी तरह चिड़ियाओं में भी युवा और बाल चिड़ियाएं अपने अग्रजों से गायन के गुर सीखते हैं, और उनके गानों की धुन और संगीत उनकी प्रजाति,उपप्रजाति या फिर उनके रहवास क्षेत्र तक की परिचायक होती है।
पक्षियों को उनकी धुन और गीत से पहचानने के लिये पक्षी विज्ञानी होना बिल्कुल ज़रूरी नहीं है, अगर आप ध्यान से सुनें तो पक्षियों के कलरव में विभिन्न चिड़ियाओं के सुर ताल को आसानी से पहचान सकते हैं, ज़रूरत है तो बस एक उत्सुकता से भरे सचेतन मन की। मध्य और दक्षिण भारत में एक चिड़िया इंसानी बस्तियों, मैदानी इलाकों और खेतों में हमारी पड़ोसी बनकर रहती आई है, जिसकी अनेक विशिष्टताओं में से एक है उसका मधुर और एक विशेष सुर ताल वाला गीत। इस चिड़िया को हिंदी में मछरिया, नाचन या चाकदिल भी कहते हैं और अंग्रेजी में 'व्हाइट स्पॉटेड फैंटेल' कहते हैं। यह चिड़िया "फैंटल" परिवार की सदस्य है, "फैंटेल" बना है "फैन" और "टेल" से, यानि ऐसी चिड़िया जिसकी पूंछ पंखे का काम देती हो।यह चिड़िया अपनी पूंछ को एक जापानी पंखे सा फैला लेती है, यह पंखा काम आता है मच्छरों और छोटे कीड़ों को उड़ाने और अस्थिर करने में।
अगर आप एक नरम कीड़े या मच्छर हों और अपने मनपसंद पेड़ या झाड़ी के किसी पत्ते पर आराम फरमा रहे हों, तभी एक पूँछनूमा पंख आपकी आरामगाह को झंझोड़े तो आप तुरंत उड़ेंगे और तब आप मछरिया या नाचन का भोजन बन जाएंगे।मछरिया नाम से ही आप सामझ गए होंगे कि इस चिड़िया का मनपसंद भोजन छोटे कीड़े और मच्छर हैं। इनकी चोंच नरम कीड़ों को खाने के लिये उपयुक्त है। आप इन्हें छोटे पेड़ों और झाड़ियों में उछलता कूदता पाएँगे। पंखी जैसी पूंछ के अलावा इनकी पहचान है इनका आकर जो कि गौरैया से थोड़ा बड़ा होता है (लंबाई लगभग 19 इंच), स्लेटी पर, पूंछ के सफेद सिरे, सफेद गला, सीने का स्लेटी भाग जिसपर सफेद चित्तियाँ होती हैं और सफेद भवें (सीने पर चित्तियाँ इन्हें सफेद भवों वाली फैंटेल से भिन्न करती हैं)।इन चिड़ियाओं के घोंसले पेड़ों और झुरमुटों में बने होते हैं, ये एक शंकु (कोन) के आकार का घोंसला बनाते हैं जिसमें मादा तीन अंडों तक देती है। नर और मादा दोनों अंडों और चूजों की देखभाल करते हैं।
नर और मादा में से नर पक्षी गाना गाते हैं , इनके सधे हुए सुर पहले ऊपर उठते हैं फिर नीचे आते हैं और फिर अंत में एक ऊंचे सुर के साथ इनका गीत समाप्त होता है। यह लगातार इस गीत की पुनावृत्ति करते हैं। इनका गीत दो छंदों का होता है और विशेषज्ञों के अनुसार इनके गायन के सुर हर साल थोड़े बदलते हैं , मूल तान वही रहती है। पिछले साल एक मछरिया या फैंटेल हमारे फ्लैट के बाहर लगे इंटरनेट की केबल पर हर सुबह पांच-साढ़े पांच बजे आलाप करता था, यह लगभग एक अलार्म सा महसूस होता था। इस साल केबल उस जगह से कहीं और चली गई इसलिये इनकी आवाज़ अब थोड़ी दूर से आती है। ये बाकी चिड़ियाओं की तरह ही सुबह और शाम को ज़्यादा सक्रिय होते हैं।
कई बार यह गाने के साथ अपना सीना फुलाकर, पर फैलाकर और अपनी पंखीनुमा पूंछ को फैलाए पेड़ की डाली पर बैठ जाते हैं और कभी सामने की तरफ तो कभी उसी जगह पर 180 डिग्री की फिरकी लेते हैं, फिर उछल कर दूसरी टहनी पर यही करामात फिर से दोहराते हैं, शायद इसीलिये इन्हें "नाचन" भी कहा जाता है। इनकी इस अनूठी नृत्य और गायन प्रस्तुति के चित्र लेने का मौका मिला, अगली बार इस दृश्य को वीडियो में कैद करने की कोशिश रहेगी। इन्हें देखकर ऐसा लगता है कि ज़माने भर की चिंताएं छोड़ कर गीत गाने और ठुमके लगाने से बेहतर कुछ नहीं है।
इस नायाब चिड़िया का ज़्यादातर समय आपके घर या अपार्टमेंट के आसपास के छोटे पेड़ों और झाड़ियों में व्यतीत होता है। इसके अलावा जब पेड़ों की टहनियां टूट कर सूख जाती हैं तब यह कई घंटों तक उन टहनियों में कीड़ों की दावत उड़ाते दिख जाते हैं। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि पेड़ों की सूखी टहनियां इनके अलावा और भी कई पक्षियों जैसे फुतकी (ऐशी प्रिनिया) और भारतीय रोबिन की पसंदीदा जगह है। इंसानी परिवेशों में सूखी टहनियां मिलना भी दुर्लभ हैं क्योंकि वे इंसानों के भी बहुत काम आती हैं, यह कश्मकश हर जगह है पर फिर भी आज हम इन चिड़ियाओं का सानिध्य प्राप्त कर पा रहे हैं, शायद हम खुशकिस्मत हैं पर अब ज़रूरत है कुदरत के हर प्राणी की ज़रूरतों को समान दर्जा देने की, चाहे वे पेड़ हों या पशु पक्षी या दूसरे इंसान।
बहरहाल यदि आप मछरिया को नाचते गाते सुनें तो ज़रूर आनंदित हों क्योंकि आप सदियों पुराना पारंपरिक संगीत जो सुन रहे हैं, अपने हृदय में इन्हें स्थान दें तो यह खुशी चौगुनी हो जाएगी। अपने और अपने आस पास सभी का ख्याल रखें , सचेतन रहें और खुश रहें।
संकल्प बक्षी







बहुत ही रोचक लिखा है। इस चिड़िया की कलाकारी,नृत्य और गायन सुनने देखने का सहज ही मन में उत्सुकता जगा रहा है। बहुत सुंदर। जारी रहे यह श्रृंखला। बधाई।💐👍👌
जवाब देंहटाएंबहुत मधुर लेख । वाकई जीवन के असली संगीत को सुनना है तो हमें सचेतन होना ही पड़ेगा ।बहुत बधाई आपको 💐
जवाब देंहटाएंशानदार लेखन है, मन की गहराईयों से निकलते हैं ऐसे विषय।
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