सचेतन होने का संकल्प
सचेतन होने का संकल्प
साल 2020 का अंत होने जा रहा है, यह साल याद किया जाएगा कोरोना और उससे चकनाचूर हुए इंसानी घमंड के साथ ही हमारी जर्जर होती सामाजिक, बौद्धिक और आर्थिक व्यवस्थाओं को उघाड़ती घटनाओं के लिये। यह साल शायद सोच समझ कर हम इंसानों को नई समझ देने आया था, पर्यावरण से बेहतर सामंजस्य बैठाने की समझ, आपसी रिश्तों से आडम्बर की चादर हटा कर असली गर्माहट महसूस करने की समझ और स्वयं पर नियंत्रण रखने की समझ और जो न समझें वे सिर्फ अनाड़ी ही नहीं बल्कि आत्मघाती आतंकवादी से कम नहीं हैं।
यह साल इंसान और पशुओं के परस्पर संघर्ष की भी कई घटनाओं को लेकर आया, जैसे पुणें की आवासीय कालोनियों में विचरते गौर बाईसन, गुरूग्राम की सड़कों पर दौड़ते हिरण आदि, इन मासूमों की ग़लतफ़हमी त्वरितरूप से दूर कर दी गई, अब फिर इंसानों की उमड़ती भीड़ हर तरफ है। ऐसी ही एक घटना हमने भी देखी, जब घर से जुड़े खाली प्लाट पर खड़े बेर के पेड़ पर पहले आग लगाई गई और फिर कुल्हाड़ी से उसे काटने की कोशिश की गई। इंसानी दृष्टि में यह सिर्फ एक सूखा, कांटेदार झाड़ीनुमा पेड़ है जिससे किसी को क्या लाभ पर असल में यह एक पूरा इकोसिस्टम है, इसमें कई छोटी चिड़ियाओं जैसे गोरैया, सूर्य पक्षी और बुलबुल के घोंसले हैं, काँटेदार पेड़ इनकी परभक्षियों से रक्षा करता है, प्लाट में उगी सूखी घास पर एक श्वान का बसेरा है,कई छोटे जीव इस काँटेदार पेड़ की छत्रछाया में पल रहे हैं।
थोड़ी जिरह और विरोध के बाद बेर का यह पेड़ फिलहाल बच गया है पर कब तक बचेगा यह नहीं कह सकते । दो तीन सालों से खड़े इस पेड़ पर यकायक आंच पड़ने के कारण पूछने पर परत दर परत इंसान और प्रकृति के मध्य संघर्ष के पहलु उजागर हुए, यह प्लॉट फलाना का है और कागज़ पूरे न होने के कारण अब तक कंक्रीट होने से बचा हुआ है, यहां दीवार और बाड़ न होने के कारण इसमें आवारा जीव जंतु और इंसान भी आने लगे हैं, इस बेर के पेड़ के आसपास नाग नागिन के रहने का शक है जो राहगीरों को नुकसान पहुंचा सकते हैं और अंत में बेर का पेड़ देखना अशुभ माना जाता है और इसे काट देना ही समाज के हित में हैं।
बचपन में मेले में रूसी गुड़िया मिला करती थी, जिसमें एक गुड़िया के अंदर उससे छोटी गुड़िया और उसके अंदर उससे भी छोटी गुड़िया रहती थी, वैसा ही यहां कुछ लगा की एक आम इंसान चाहे वह ग्रामीण तबके से हो या शहरी, सबके भीतर की आखिरी गुड़िया अज्ञानता और अंधविश्वास की होती है जो सबसे ज़्यादा विध्वंस करवाती है। कोई भी सामान्य समझ और पर्यावरण के प्रति सचेत व्यक्ति बेर का पेड़ काटे बिना इन समस्याओं का निदान कर सकता है। मसलन, सर्पों को भगाने के लिये पेड़ काटना ज़रूरी नहीं है,उसके नीचे उगी झाड़ियों को कुदाल से साफ कर यह काम हो सकता है, इससे उनके छुपने की जगह नहीं रहेगी, एक पुराना कपड़ा जला कर उसका धुआं करने से भी सांप चले जाते हैं, प्लाट में कूड़ा फेंकना बंद करना होगा जिससे चूहे वहां न आएं, सापों का खाना नहीं तो सांप भी नहीं। इसके अलावा असामाजिक तत्वों का आना रोकना है तो प्लाट के मालिक को एक बाड़ का इंतज़ाम करना चाहिए। इसके साथ ही नगर पालिका को यह सुनिश्चित करना चाहिए की जगह-जगह कूड़ेदान हों और लोग यहां कचरा न डालें।
उपाय बहुत हैं पर उन्हें लागू करने के लिये सरकारी तंत्र और समुदायिक विमर्श की बहुत जरूरत है। कहीं सरकारी तंत्र शिथिल और भ्रष्टाचार में लिप्त है तो कहीं उन्हें पर्यावरण से सामंजस्य बिठाकर कार्य करने का अनुभव ही नहीं है। समुदाय की बात करें तो जागरूकता की कमी सर्वव्यापी है, समुदाय के तथाकथित ठेकेदार खुद पर्यावरण के प्रति उदासीन हैं। इन सबके बीच ज़रूरत है ऐसे सचेतन व्यक्तियों की जिनके ज़हन में पेड़, पशु और पक्षी इंसानों जितने ही ज़रूरी हों, जो अपने और अपने आसपास उठे हर कदम को पर्यावरण की बेहतरी की कसौटी पर तोल सकें। आशा है की हम सभी आने वाले वर्ष में प्रकृति को अपने हृदय में स्थान देने का संकल्प लेंगे, गौरैया की चहचहाहट सुनने और खट्टे मीठे बेर खाने के लालच में ही सही। आप सभी को नए वर्ष की शुभकामनाएं, स्वस्थ रहें और सचेतन रहें।
संकल्प बक्षी


कष्टों में बीते साल 2020 को इस खूबसूरत और विवेक पूर्ण बिदाई देता आपका इस वर्ष का यह आलेख बहुत सीख देता है, महत्वपूर्ण है। पर्यावरण और जीव जगत हितैषी होकर हमारी समझ को बढ़ाता है। नए वर्ष के लिए बहुत शुभकामनाएं। 💐💐
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