बर्ड फ्लू : संवेदना से संक्रमण पर विजय
बर्ड फ्लू : संवेदना से संक्रमण पर विजय
आज की पोस्ट में हम बर्ड फ्लू या एवियन फ्लू की बात करेंगे, जी हां यह वही बर्ड फ्लू है जिसकी खबर से ही नॉनवेज के शौकीन लोगों के चेहरों की हवाइयां उड़ने लगती हैं और व्हाट्सऐप और सोशल मीडिया पर मुर्गों के मीम और चुटकुलों का बाजार गर्म होने लगता है। चुटकुलों से विपरीत इस बीमारी से प्रभावित पक्षियों और मुर्गी पालन और बिक्री से जुड़े इंसानों के लिये यह अत्यंत गंभीर विषय है।
पहले इंसानों की बात करते हैं, इस वर्ष ही बर्ड फ्लू से देश भर में करोडों का नुकसान हो चुका है। बीमारी के लक्षण दिखते ही मुर्गे मुर्गियों/बत्तखों के सम्पूर्ण जत्थे को मिटाना पड़ता है, इसे न्यूनीकरण (अंग्रेज़ी में कलिंग) भी कहा जाता है। यहां इंसानी फ्लू की तरह दवा या टीके आदि से इलाज करने की संभावना कम रहती है, इसका प्रमुख कारण है कि उच्च रोगजनकता (हाई पैथोजनेसिटी) के विषाणु से संक्रमित पक्षी के बचने की संभावना दस प्रतिशत से भी कम होती है और इन बीमारों को ठीक करने से सस्ता होता है इनका न्यूनीकरण कर देना। पूरा जत्था इसलिये नष्ट करना पड़ता है क्योंकि यहां दैहिक दूरी से विपरीत पिंजडों में पक्षी ठसाठस भरे होते हैं, जहां एक को संक्रमण हुआ तो उसे फैलने से रोकना बहुत ही मुश्किल होता है, मात्र 28 घंटे में पूरा झुंड संक्रमित हो खत्म हो जाता है । मुर्गी पालकों के अलावा इनकी आपूर्ति श्रृंखला (सप्लाई चेन) से जुड़े व्यवसाय जैसे परिवाहन सेवा संस्थाएं, बूचड़खाने , मांस विक्रेताओं आदि को भी काफी नुकसान पहुंचता है। संक्रमण के डर से अंडे और चिकन के शौकीन इंसान मन मसोस कर पनीर और सोया से गुज़ारा करने लगते हैं।खबरों के अनुसार अब तक भारत में एक भी इंसानी जान इस बीमारी से नहीं गई है।
अब उनकी बात करते हैं जिन्हें ऐसे भी मरना है और वैसे भी। कोरोना वर्ष 2020 में बर्ड फ्लू के कारण 35 से 40 लाख पोल्ट्री पक्षी सिर्फ भारत में मारे जा चुके हैं, अन्य मरने वाले पक्षियों की संख्या 3-4 लाख है। ज़्यादातर बर्ड फ्लू संबंधी खबरों में पक्षियों की जान से ज़्यादा इंसानी माल के नुकसान की बात होती है पर प्रकृति नें इंसानों और इन पक्षियों में समान चेतना दी है इसलिये इनकी मृत्यु को न्यूनीकरण कह कर महत्वहीन बना देना गलत है और इसी सचेतन भावना में बर्ड फ्लू से बचाव के सूत्र छिपे हैं।
बर्ड फ्लू को एवियन इन्फ्लूएंजा भी कहा जाता है, यह बीमारी इन्फ्लुएंजा ए विषाणुओं से फैलती है । यह विषाणु प्राकृतिक रूप से जंगली जलीय पक्षियों में निष्क्रिय अवस्था में पाए जाते हैं । जब ये पक्षी जैसे विभिन्न प्रकार की जल मुर्गियां और बतखें या इनका मांस, पंख या मल-मूत्र घरेलू मुर्गे मुर्गियों, बतखों, कबूतरों और कौवों आदि के संपर्क में आता है तो यह बीमारी फैलती है ।
मुर्गे मुर्गियों की तरह ही कई जगहों से यकायक कबूतरों और कौओं की सामूहिक मृत्यु की घटनाएं,बर्ड फ्लू के संक्रमण का सूचक होती हैं।यह देखा गया है कि प्रवासी पक्षियों के गर्म प्रदेशों में आगमन और रहवास के दौरान इस बीमारी के मामले ज़्यादा देखने में आते हैं। वन क्षेत्रों के लगातार सिकुड़ने के कारण प्रवासी और शहरी या घरेलू पक्षियों के आपसी संपर्क के आसार काफी बढ़ जाते हैं जिसके कारण इन्फ्लुएंजा के निर्जीव विषाणु इन घरेलू पक्षियों के शरीर में पहुंच कर इन्हें संक्रमित कर देते हैं जो इनके लिये जानलेवा साबित होते हैं । कहते हैं ना जो जहां है वह वहीं ठीक है, इसीलिये जंगलों को काटकर इन पक्षियों का रहवास क्षेत्र इंसानों ने खुद इन विषाणुओं को आमंत्रित किया है, जैसे कोरोना को किया वैसे ही। यह विडंबना ही है ऐसी बीमारियों के फैलने के बावजूद नित नई नीतियों से पर्यावरण की लगातार अनदेखी हो रही है।
यह बीमारी इंसानों के लिये कोरोना और अन्य विषाणुओं से कम घातक है, इसके मुख्य कारण हैं कि इसके विषाणु हवा में नहीं तैरते जिससे सांस लेने से ही संक्रमण होने के आसार कम होते हैं, इसके अलावा यह संक्रमित इंसान से स्वस्थ इंसान तक जाने में फिलहाल अक्षम है, पर विषाणुओं की जिजीविषा और रूपांतरण का कोई सानी नहीं है, ये कभी भी किसी नए स्ट्रेन के रूप में इंसानों से भी फैल सकता है इसलिये सावधानी ज़रूरी है। यह बीमारी संक्रमित पक्षियों के मांस, पर और मल-मूत्र से से सीधे संपर्क में आने पर फैलती है, इसीलिये सबसे पहले पोल्ट्री के साथ सीधे तौर पर कार्य करने वाले इंसानों को पी पी ई वस्त्र पहन कर कार्य करने की हिदायत दी जाती है। इसके अलावा जीवित पक्षियों के बाज़ार बंद किये जाते हैं । ये जीवाणु साबुन से हाथ धोने से भी ये नष्ट हो जाते हैं। इसके अलावा अगर मांस को 80 डिग्री तक पका लेने से भी यह नष्ट हो जाते हैं।
बर्ड फ्लू के फैलने की खबर से कई लोग कौओं और कबूतरों आदि को खाना - पानी देना बंद कर देते हैं,ऐसा करने से पहले खुद से एक सवाल करें - एक स्वस्थ कबूतर या कौआ संक्रमित होने के बाद कितनी देर जीवित रहेगा (28 घंटे तक),यदि वह संक्रमित है भी तो क्या उसे एक निश्चित दूरी से दाना पानी देने में हर्ज है?, यह विषाणु हवा से नहीं फैलते, अतः जब तक कोई कौए, कबूतर या मुर्गे-मुर्गी से सीधे संपर्क में नहीं आ रहा है तब तक संक्रमण की आशंका न के बराबर है। क्या हम मनुष्य किसी अन्य मनुष्य के बीमार पड़ने पर उसे खिलाना पिलाना बन्द कर देते हैं, तो फिर इन बेज़ुबानों से यह बर्ताव क्यूँ ?
यह भी विचारणीय है कि बर्ड फ्लू का संक्रमण उन मुर्गी पालन संस्थाओं में ज़्यादा फैलता है जहां बंद और अंधेरे कमरों या पिंजड़ों में ज़्यादा पक्षियों को ठूस कर रखा जाता है। यह ज़ाहिर सी बात है कि दूरी न होने के कारण संक्रमण तेज़ी से फैलेगा पर इसके साथ ही जगह कम होने और गंदगी भरे रख रखाव से ये पक्षी मानसिक अवसाद और रोगों से भी ग्रस्त हो जाते हैं जिससे इनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता बहुत कम हो जाती है। ग्रामीण क्षेत्रों में जहां मुर्गी पालन खुले दड़बों में किया जाता है वहां संक्रमण की समस्या कम देखी गई है।
जहां यह समझना ज़रूरी है कि अंडे और चिकन आदि देश के कई लोगों के लिये प्रोटीन और पोषण का प्रमुख स्रोत हैं वहां यह सोचना भी बेहद महत्वपूर्ण है की इनकी अत्याधिक ख़पत और बेहिसाब खान पान से इन पक्षियों के उत्पादन पर जबरदस्त दबाव पड़ रहा है। अधिक से अधिक मुनाफा कमाने की होड़ में गलत तरीकों से इनका पालन हो रहा है जैसे मांसपेशियां बड़ी करने की दवाओं का इस्तेमाल, कम जगह में ज़्यादा पक्षियों का रख रखाव आदि
। बर्ड फ्लू से सर्वाधिक प्रभावित देशों जैसे हॉन्ग कोंग में इस बीमारी से लड़ने के लिये कड़े नियम बनाए गए हैं जैसे पिंजड़े में पक्षियों की सीमित संख्या, मंडियों में बिक्री के नियम जैसे दुकानों के बीच निश्चित दूरी, हफ्ते में एक दिन का अवकाश आदि और सबसे महत्वपूर्ण पक्षियों का विषाणु विरोधक टीकाकरण। भारत में शायद पक्षियों का टिकाकरण एक अतिशयोक्ति होगी पर इनके रख रखाव और बिक्री के नियमों में सुधार और उनका सख्ती से पालन बहुत ज़रूरी है।
आज का महामानव खाद्य श्रृंखला के शीर्ष पर है, वह नियम बनाता भी है और उन्हें तोड़ता भी है, जिसे चाहे खा भी सकता है पर प्रकृति के नियम बड़े ही कठोर हैं और जब भी इन्हें दरकिनार कर पक्षियों और दूसरे जानवरों का भक्षण किया गया है तब किसी नए विषाणु या बीमारी की आहट ने मनुष्य के अहम को तोड़ा है, बर्ड फ्लू और कोरोना इसका साक्षात प्रमाण हैं। इसीलिये जब बर्ड फ्लू आहट दे तब आप कबूतर या किसी अन्य पक्षी को दाना पानी देने में सकुचाएँ नहीं, क्योंकि आपकी संवेदना ही अन्ततः प्रकृति का संतुलन बना संक्रमण पर विजय प्राप्त करेगी, खूब खुश और सचेतन रहें।
संकल्प बक्षी ।
(चित्र गूगल से साभार)



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