इंसान कहीं के

 इंसान कहीं के ।।


"गधे कहीं के" - इंसानी बोलचाल में किसी दूसरे इंसान को गधा कह देना आम बात है, हिंदी हो या अंग्रेज़ी "गधे" या  अंग्रेज़ी में "एस" ज़्यादातर एक छोटी मोटी गाली की तरह इस्तेमाल होता आया है। इस संदर्भ में "गधा" अर्थाथ एक मंदबुद्धि, अड़ियल किस्म का प्राणी जो आसान से आसान बात भी न समझता हो। इसके अलावा इंसानों की तुलनात्मक और संकीर्ण सोच के अनुसार गधा वह भी है जो घोड़ा नहीं बन पाया। घोड़ा यानी रफ्तार और मजबूती का प्रतीक और गधा यानी बोझा ढोने का आदि, बेबकूफी और अड़ियल रवैये का पर्याय।


बहुत ही आसानी से हम एक ही परिवार के प्राणियों को अलग अलग ढंग से देखने लगते हैं जैसे हम एक ही इंसानी परिवार के दो सदस्यों को देखते हैं । जहां गधे और घोड़े दोनों को प्रकृति ने अलग अलग शख्सियतों और गुणों से नवाजा है, हम इन्हें इनकी वाणिज्यिक और सामाजिक उपयोगिता से ही आंकते आए हैं। गधा यानी एक कामकाजी पशु जिसे ज़्यादातर बोझा ढोने के काम में लिया जाता है और घोड़ा एक राजसी पशु जो सवारी करने और दौड़ के काम में लिया जाता है। बहरहाल गधे और घोड़े की तुलना करना अमरूद और सेब की तुलना करना जैसा निरर्थक है ।


आज गधे ग्रामीण परिवेशों में ही देखने को मिलते हैं पर इनका भी एक समय था, लगभग 5000 वर्षों पहले से मनुष्यों और गधों के साथ-साथ रहने के प्रमाण मिलते हैं। कभी ये मालवाहक पशु रहे हैं, कभी सवारी के काम आए, तो कहीं इन्हें सूखाग्रस्त इलाकों में दूध और मांस के लिए भी पाला जाता रहा है। नर गधे और मादा घोड़ी के मिलन से जन्मे खच्चर दुर्गम पहाड़ी और रेगिस्तानी इलाकों में सवारी के काम में लिये जाते रहे हैं। फिर इंसानों के लिए इतना उपयोगी पशु गधा एक अपशब्द कैसे बन गया।


सहज और अपनी तासीर न छोड़ने वाला जीव है गधा। गधों में आत्मसंरक्षण (सेल्फ प्रिजर्वेशन) की भावना प्रबल होती है जिसके कारण वे अन्य प्रजातियों जैसे इंसानों के हुक्म की तामील आसानी से नहीं करते जबकि अपने झुंड में यह बखूबी सारे नियम और तौर तरीके निभाते हैं। लीक से हटकर चलने वालों को समाज गधा ही समझता और कहता आया है। आत्मसंरक्षण से ही प्रेरित होती है इनकी दुलक्ति ( पिछली टांगों से उछल कर चोट करने की हरकत) जिसका इस्तेमाल ये अपने कुनबे को बचाने के लिये करते हैं। 


आज के पालतू (डोमेस्टिक) गधे की उत्पत्ति अफ्रीकी जंगली गधे से हुई है, वहां के गर्म और शुष्क इलाकों में रहने वाले ये जीव अपनी सख्त मोटी चमड़ी, तेज़ दौड़ और सूखी घास और झाड़ियों को खाने और पचाने की क्षमता से इतने वर्षों तक फलते फूलते रहे। यही गुण पालतू गधे को कठिनतम परिस्थितियों में रहने की जिजीविषा देते हैं, भारत में ही देखें तो ये लद्दाख जैसे सर्द प्रदेशों में, राजस्थान और गुजरात के सूखे और गर्म स्थानों में और दक्षिण में आंध्र और तमिलनाडु तक में पाए जाते हैं। विश्व के सभी महाद्वीपों पर इनकी उपस्थिति है जिसकी जड़ें अफ्रीका के यूरोपीय उपनिवेशण (कॉलोनाइसेशन) और इससे जुड़े इंसानों, पशुओं और अन्य संसाधनों के दोहन और व्यापार से जुड़ी हैं।


गधे अपने प्राकृतिक रूप में झुंड में रहते हैं जिसका नेतृत्व एक शक्तिशाली नर करता है। नर, मादाओं से आकार में बड़े होते हैं। इनका प्रसवकाल ग्यारह से चौदह महीनों तक का होता है। नवजात के जन्म के बाद मादा तब तक प्रजनन के लिए तैयार नहीं होती जब तक उसका शिशु उस पर आश्रित होता है। जहां प्रजनक (ब्रीडर) तीन सालों में घोड़े की तीन संतान ले पाते हैं वहां गधे की तीन संतान अर्जित करने में चार साल तक का समय लग जाता है। ज़ोर ज़बरदस्ती पर भी मादा अपने नवजात का त्याग नहीं करती है। इन विलक्षण जानवरों का दूसरी प्रजाति के जानवरों के प्रति व्यवहार भी प्रेम और वात्सल्य से भरा होता है, कई अस्तबलों में गधों को घोड़ों के साथ रखा जाता है, इनकी उपस्थिति से परेशान घोड़े शांत हो जाते हैं। इन्हें दूसरे जानवरों की सुरक्षा के लिये भी पाला जाता रहा है।ये अपनी भावनाएं चिरपरिचित ढेंचू-ढेंचू की आवाज़ से व्यक्त करते हैं। जंगलों में यह एक झुंड से दूसरे तक संकेत पंहुचाने का भी तरीका होता है, जैसे भेड़िए हुआँ हुआँ की आवाज़ करते हैं। इनकी शांत उपस्थिति और इंसान और अन्य जानवरों के साथ सहज रूप से रह पाने के कारण आज कई विकसित देशों में लोग इन्हें माल ढोने के लिये नहीं बल्कि अपने घरों के सदस्य की तरह रखने लगे हैं।


इंसानों ने जब इन्हें पालतू बनाया तब उन्हें एक ऐसा साथी मिला जो कम से कम रखरखाव में उनका अधिक से अधिक काम कर पाता था।दुर्गम से दुर्गम स्थानों में इंसानी बोझ उठाते आए गधों की संख्या में आज कमी आ रही है। अब इंसान को इनके काम से ज़्यादा इनके माँस की ज़रूरत हो रही है। चिरपरिचित चीनी खाद्य उपचार में इनके मांस और विशेषकर चमड़े से बनने वाली जिलेटीन नुमा दवा की बहुत मांग है जिसके कारण अफ्रीका के कई देशों जैसे कीनिया आदि में गधों के प्रजनन फार्म खुल गए हैं। पर्यावरण संस्थाओं के विरोध के बाद कुछ देशों जैसे तंज़ानिया ने गधे के मांस का निर्यात बंद कर दिया है। भारत के कुछ इलाकों जैसे आंध्रप्रदेश में कुछ वर्षों से गधे के दूध और मांस का कारोबार अच्छा खासा बढ़ गया है, इनके दूध और मांस से डाइबिटीज़, गठिया और कमज़ोरी के इलाज के दावे किए जा रहे हैं। कुछ अन्य यूरोपीय देशों में भी गधे के मांस, विशेष रूप से जननांगों के "खास व्यंजन" परोसे जा रहे हैं। भारत समेत कई देशों में गधों को दुधारू जानवरों जैसे गाय, भैंस और बकरी की फेरहिस्त में जोड़ा जा रहा है, जल्दी ही आपके निकटतम "मिल्क पार्लर" में गधी का दूध मिलने लगेगा और फिर शुरू होगा इनके शोषण का नया दौर। आज तक मनुष्यों की मानसिक कमज़ोरी दूर करने की कोई दवा नहीं बन सकी है और न बनने के आसार हैं।


वैसे ठीक ही तो है, अब बोझ उठाने के लिए तो मशीनें और अन्य इंसान हैं ही, तो गधों को खाद्य पदार्थ के रूप में काम लेना कुछ गलत तो नहीं। मनुष्य का तो जन्म ही प्रकृति के हर जीव का दोहन और शोषण करने के लिये हुआ है, उस पर मिथ्याभिमान ऐसा की पल भर में एक संपूर्ण प्रजाति की पहचान को तिरस्कार भरी गाली का नाम दे दे। हम वे हैं जो पौधे भी इसलिये लगाते हैं कि उनके फल, फूल ग्रहण कर सकें, पशुओं की तो बिसात ही क्या।आज के लालची और भोगी मनुष्य के मुकाबले मेहनतकश, सहज, समर्पित और प्रेम से परिपूर्ण गधे का आचरण ज़्यादा अनुकरणीय है। आज के परिपेक्ष्य में किसी इंसान के कृत्य पर शर्मिंदगी होने पर उन्हें बस इतना ही कहना बहुत है, "इंसान कहीं के"।


संकल्प बक्षी

(चित्र गूगल से संलग्न)


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https://www.hindustantimes.com/india-news/official-worried-about-decline-in-donkey-population-in-andhra-pradesh-blames-misconception-101614772774343.html


https://www.npr.org/sections/goatsandsoda/2019/04/30/716732762/donkeys-are-dying-because-china-wants-their-hides-for-a-traditional-remedy


https://www.indiatvnews.com/amp/fyi/donkey-milk-dairy-benefits-price-of-milk-details-all-you-need-to-know-donkey-halari-breed-haryana-national-research-centre-on-equines-641089


टिप्पणियाँ

  1. गधों के बारे में बढ़िया तरीके से रोचकता से व्यापक जानकारी प्रस्तुत की है आपने। गधों के बारे में हमारा 'गधापन' थोड़ा तो दूर हुआ। भाषा शैली खासी मजेदार है। बधाई।💐👌

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