यूं ही नहीं बन जाती हर ज़मीन बुंदेलखंड

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यूं ही नहीं बन जाती हर ज़मीन बुंदेलखंड


पशु-पक्षियों से विपरीत मनुष्य एक ऐसा प्राणी है जो मूलभूत ज़रूरतों के अलावा भी बहुत कुछ पाने की इच्छा रखता है। हर इंसान अपनी मौजूदा परिस्थितियों से उठ कर और बेहतर करने की इच्छा रखता है, ज़्यादातर इन इच्छाओं का प्रतिरूप एक बेहतर मकान या बेहतर वाहन आदि होते हैं। कहाँ से आते हैं ये और बेहतर मकान? मांग और पूर्ति के सिद्धांत पर कृषि और उपवनों की जमीनों पर हर वर्ग की ज़रूरतों को पूरा करने के लिये बहुमंजिला इमारतें, डुप्लेक्स,बंगले आदि बना दिये जाते हैं । इनके भर जाने के बाद नई ज़मीनों की खोज शुरू हो जाती है।


मैदानों के अलावा भी ये ज़मीनें कहीं से भी अवतरित हो सकती हैं, पहाड़ों की छाती फोड़ कर तो कभी झीलों की देह में बजरी ठूंस कर। इन पर रहने वाले वर्षों पुराने वृक्षों को काट दिया जाता है, कुछ ही दिनों में इन जगहों का कायाकल्प कर दिया जाता है। इस रूपांतरण में इस्तेमाल होने वाली कंक्रीट, चिकनी मिट्टी, पत्थर और रेत भी नदियों की तलहटी कुरेद कर और पहाड़ों की चट्टानों को पीस कर प्राप्त की जाती है।


आखिरकार इन रम्य स्थानों पर बहुमंजिला अपार्टमेंट्स, होटल आदि खड़े हो जाते हैं। इनकी अवस्थिति के कारण इनमें रहने का दाम भी अधिक चुकाना पड़ता है। दाम चुकाकर मनुष्यों का कुनबा इन घरों में आ बसता है, सब कुछ मिल जाता है यहाँ - बच्चों के खेलने की जगह , किराने की दुकान, व्यायाम के लिये वातानुकूलित जिम आदि। पर गर्मियां आते ही नल में पानी आना बंद हो जाता है। सरकारी जल आपूर्ति बंद हो जाने पर, मजबूरन मासूम रहवासियों को पानी का टैंकर मँगवाना पड़ता है। एक बार फिर माँग और आपूर्ति के सिद्धान्तनुसार टैंकर दौड़ने लगते हैं, उन झीलों की तलाश में जिनकी देह में अब भी कुछ बूंदें शेष हों ।


यूं ही नहीं बन जाती हर ज़मीन बुंदेलखंड।


संकल्प बक्षी।




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