सूखे स्थानों को दे सकते हैं पेड़ों की सौगात
पर्यावरण पर केंद्रित महत्वपूर्ण पत्रिका "प्रकृति दर्शन" के ताज़ा अंक में मेरे आलेख को स्थान मिला है।
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आलेख:
सूखे स्थानों को दे सकते हैं पेड़ों की सौगात
बरसात का मौसम शुरू हो चुका है। हम इंसानों के साथ-साथ अन्य पशु, पक्षी, पेड़ पौधे और धरती भी जीवन दायिनी वर्षा की बेसब्री से बाट जोहते रहते हैं। जैसे ही बारिश की झड़ी लगती है, बंजर से बंजर भूमि भी हरीतिमा से भर उठती है।
जहाँ धरती के सभी प्राणी वर्षा पर आश्रित हैं, वहीं वर्षा ऋतु का आगमन भी इन्हीं प्राणियों पर निर्भर है। इसे अगर गौर से समझना हो तो पिछले कुछ वर्षों में आपके आसपास के क्षेत्रों में वर्षा चक्र का अवलोकन करें - कहीं अतिवृष्टि है तो कहीं अनावृष्टि। जंगलों की कटाई और अंधाधुंध औद्योगिकरण से वायुमंडल में कार्बन डाई ऑक्साइड और अन्य हरितगृह गैसों की मात्रा बढ़ जाती है, इससे धरती का तापमान बढ़ता है और ये बढ़ता तापमान हिमखंडों और ग्लेशियरों को पिघलाकर महासागरों का जलस्तर और बढ़ा देता है , बढ़ते तापमान और जलस्तर के कारण समुद्री तूफान उठते हैं जो वर्षा लाने वाली हवाओं का रुख, समय और तीव्रता को अस्त-व्यस्त कर देते हैं। नतीजन मानसून के आवागमन का निर्धारित समय और अनुपात बदल जाता है।
इसमें हम और आप क्या कर सकते हैं? औद्योगिकरण तो वैश्विक स्तर पर हो रहा है और हम थोड़े ही जंगल काट रहे हैं। पर आप अपनी ताकत नहीं जानते मित्रों, हमारी छोटी से छोटी पसंद से पूरे तंत्र पर असर पड़ता है। मसलन बरसात की झड़ी लगने पर पकौड़े तलने के लिए आप कौनसा तेल इस्तेमाल करते हैं? अगर हम में से ज़्यादातर लोग सोयाबीन का तेल इस्तेमाल करेंगे तो वैश्विक स्तर पर सोयाबीन की पैदावार बढ़ेगी और अगर हम पाम या ताड़ का तेल पसंद करेंगे तो ताड़ के पेड़ों को उगाने वालों की तादाद बढ़ जाएगी। इंडोनेशिया और मलेशिया में जंगलों को अंधाधुन्द काटकर ताड़ के पेड़ लगाए गए जिससे उन जंगलों में रहने वाले ओरांगुटान और अन्य जीव विलुप्त होने के कगार पर पहुंच गए। ताड़ के तेल की प्रति एकड़ उपज अन्य तेलों से अधिक है इसलिये नियंत्रित रूप से उगाने पर इसकी खेती का पर्यावरण पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। यह नियंत्रण तभी आ सकता है जब हम सभी संयमित रूप से कृषि उत्पादों का प्रयोग करें, मतलब तेल, अनाज आदि की खपत पर नियंत्रण बनाएँ।
इसी तरह अगर आप अपने प्रियजनों को उपहार स्वरूप हीरा देना पसंद करते हैं तो हीरे के दाम और खुदाई दोनों बढ़ेंगे। यह खुदाई कहाँ होगी? उसी भूमि पर जहाँ आज जंगल हैं। आज मध्यप्रदेश के छतरपुर से सटे बक्सवाहा जंगल के दो लाख पेड़ काटे जा रहे हैं क्योंकि पेड़ और जंगल तो फिर उग आएंगे पर उस जमीन के नीचे के हीरे "सदा के लिए हैं"।पर पेड़ सदा के लिए नहीं हैं दोस्तों, एक भरा पूरा वृक्ष विकसित होने में सालों लग जाते हैं।
तो फिर, आप अपनी पसंदीदा जीवनदायिनी वर्षा का स्वागत कैसे करेंगे? मेरा सुझाव मानें तो आप बारिश की बूंदों का स्वागत बीज बम फोड़ कर करें। जी हाँ, एक ऐसा बम जिसमें आपके पसंदीदा पेड़ों के बीज हों। आप फलदार पेड़ों (आम, जामुन आदि), प्राचीन और औषधिक पेड़ों (नीम, बरगद, पीपल, बहेड़ा, खेर आदि) या आपके इलाके की आबोहवा के अनुसार उपयुक्त पेड़ों के बीजों का इस्तेमाल कर सकते हैं। बारिश का मौसम आते ही इन बमों को अपने इलाके के बंजर स्थानों पर फेंक दें । बरसाती अमृत से इनमें से ज़रूर कुछ बीज पौधे और पेड़ बन जाएंगे। सूखे और निर्जन इलाकों को हरा भरा करने की इस प्राचीन तकनीक को जापानी कृषि वैज्ञानिक मासानोबू फुकूओका ने 1970 में पुनर्जीवित कर इस्तेमाल किया।
बीज बम बनाने के लिये आप फलों के बीजों को सुखा लें, अन्य किसी पेड़ या पौधे के बीज भी हों तो उन्हें भी सुखा लें। एक या एक से अधिक बीज को जैविक खाद, चिकनी मिट्टी और पानी मिलाकर गेंदनुमा आकार दे दें। अब इन गेंदों को सुखा लें, लीजिये तैयार हैं आपके बीज बम। अब जब आप बारिश की छटा निहारने बाहर निकलें तो इन्हें अपने साथ रखें और सूखे स्थानों पर फेंक दें। ऐसे संयुक्त प्रयासों से हम सूखे स्थानों को पेड़ों की सौगात दे सकते हैं।
और पेड़ हमें क्या दे सकते हैं? स्वच्छ वायु, मीठे फल, चिड़ियाओं और जीवों की आहट और तन मन भिगो देने वाली बारिश की झड़ी। तो इस बार बारिश का स्वागत कैसे करेंगे आप ?
संकल्प बक्षी




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