गुलदुम बुलबुल - सुरीली बांग के स्वामी
गुलदुम बुलबुल - सुरीली बांग के स्वामी
वह कौनसे पक्षी हैं जिनके सामने सुबह-सुबह अपनी बांग से सबकी नींद उड़ाने वाले मुर्गे भी लेट लतीफ कहे जाएँगे। उस पर स्वर इतना मधुर की ऐसा आभास हो जैसे कोई मिट्ठू या हरिमन तोता सुरीली तान छेड़ रहा हो "मिट्ट ठू - मिट्ट ठू"। अगर आपके घर के आसपास थोड़े बहुत भी पेड़ हैं और आप उत्तर, मध्य या दक्षिण भारत के किसी स्थान पर हों, तो हर सुबह इस पक्षी की समय सारणी सी धुन को न सुन पाना मुश्किल है, चूक बस इन्हें पहचानने में हो जाती है। ये पक्षी हैं काला टोप पहनें अपनी दुम के नीचे लाल सुर्ख धब्बे वाले गुलदुम बुलबुल । ये भोर अँधेरे सबसे पहले उठने वाले पक्षियों में से एक हैं । भारत के ही तीन प्रान्तों के अलग-अलग शहरों में सुबह पाँच से साढ़े पाँच बजे की बीच मैंने इन पक्षियों की लगभग एक जैसी तान वाली बोली सुनी है। सुबह होते ही गुलदुम बुलबुल नर उस इलाके के एक ऊँचे पेड़ की शाखा या केबल या बिजली के खंभे जैसा सुविधायुक्त स्थान ढूँढता और बुलंद आवाज़ में अपने गीत की शुरुआत करता। यह ऐसा प्रतीत होता है जैसे वह किसी सैन्य छावनी का कमांडर है और अपनी टुकड़ी को मुस्तैदी से दिन शुरू करने के लिए प्रेरित कर रहा है। शायद वह मौसम का हाल बताता हो या अपने झुंड के पक्षियों को आज के दिन की समय तालिका समझा रहा हो या वह अपनी प्रेयसी से प्रेम का इज़हार कर रहा हो, यह कहना मुश्किल है।
अगर आप भारतीय उपमहाद्वीप के किसी भी देश में हों, या फिर पूर्व में बर्मा में , पश्चिम में अफ्रीका के अल्जीरिया और सूडान में और दक्षिण में ऑस्ट्रेलियाई महाद्वीप पर हों, तो यह मुमकिन है कि आपने इस पक्षी के दर्शन किये होंगे । गुलदुम बुलबुल की कई उपप्रजातियाँ हैं जिनके रूप रंग थोड़े बहुत अलग दिखते हैं पर इनके सबसे प्रमुख चिन्ह हैं सर पर काले टोपे सा उठाव और पूंछ के नीचे लाल रंग का धब्बा । इन्हें गुलदुम इसीलिये कहा जाता है क्योंकि इनकी पूंछ के नीचे फूल या गुल है। इनके पंख काले-भूरे चित्तीदार से दिखते हैं और पेट सफेद रंग के परों से ढका होता है। पंजों पर छोटे छोटे नाखून पेड़ों की डाल पर पकड़ बनाने का काम करते हैं।
वैसे ऑस्ट्रेलियाई और यूरोपीय देशों में इन्हें परजीवी (पेस्ट) और आक्रमणकारी की संज्ञा दी गई है क्योंकि ये पक्षी वहाँ के क्षेत्रीय पक्षी प्रजातियों से रहने और खाने में प्रतियोगिता करते थे और उन पक्षियों की संख्या पर इसका बुरा असर पड़ रहा था। इन देशों में सरकार ने मुनादी करवा रखी है कि बुलबुल जैसे किसी भी पक्षी के दिखने पर तुरंत रिपोर्ट करें ताकि उन्हें पकडा जा सके और उनके घोंसलों को नष्ट किया जा सके । हम इंसान अपने मन मुताबिक बेजान पक्षियों के साथ खिलवाड़ करते आए हैं। गुलदुम बुलबुल को सबसे पहले भारत में देखा गया था और ये सचमुच उत्तर में हिमालय के पहाड़ी इलाकों से लेकर दक्षिण के वर्षा वनों और समुद्री किनारों तक पाई जाती है, इन्हें सबसे पहले पॉन्डिचेरी में देखा गया था। इतने विस्तृत क्षेत्र और वातावण में रहने वाले इस पक्षी का ऑस्ट्रेलिया या अफ्रीका में पनपना कोई अतिशयोक्ति नहीं। आज विदेशो में रहने वाले भारतीयों की औसत आय वहां बसे दूसरे बाशिंदों से अधिक है तो क्या वहाँ की सरकारें भारतीय मूल के लोगों को बंदी कर उन्हें वापस भेज रही हैं? नहीं न क्योंकि न सिर्फ यह अंतरराष्ट्रीय मानवीय मूल्यों से जुड़े नियमों के विरुद्ध है बल्कि सभी इंसानों के समान अधिकारों पर चोट है । भारतीय मूल के लोग भी बुलबुल की तरह ही अपने मूलक्षेत्र से दूर दूसरे क्षेत्रों के माहौल में ढलकर, अपनी मेहनत और उद्धमता से वहॉं फल फूल रहे हैं फिर बुलबुल को आक्रमणकारी कहकर उनका दमन करना कितना सही है । वैसे ज़्यादातर इंसानी इलाकों की बुनियाद दमन और शोषण के दम पर रखी गई है और इंसानों में समानता का तानाबाना काफी उलझा हुआ है पर जीव जंतुओं और इंसानों में समानता के बारे में सोचना ही बड़ी बात है।
तो प्रश्न यह उठता है कि बुलबुल इन देशों में कैसे पहुंची? भारत में बुलबुल नर को धागे से बांधकर एक दूसरे से लड़ाने की कुप्रथा थी। शायद भारत के बंधुआ मजदूर जिन्हें अफ्रीका की खदानों, यूरोप, ऑस्ट्रेलिया या अमरीका के कारखानों और खेतों में काम के लिए ले जाया गया, वे अपने साथ उन बुलबुल पक्षियों को ले गए हों। बुलबुल समूह में रहने वाला पक्षी है, जब किसी खतरे का अंदेशा होता है तब सभी पक्षी एक स्वर में "टी टी टी" की ध्वनि में लगातार बोलते हैं और अपने रहवास क्षेत्र का बचाव करते हैं। इनकी इस सुरक्षात्मक प्रवत्ति को इंसानों ने लड़ाने में प्रयोग किया ।
ये पक्षी भारत में जून से सितंबर तक प्रजनन करते हैं और एक बार में दो से तीन अंडे देते हैं। इनका घोंसला तिनकों से बने दौने सा दिखता है और भीतर नरम कपडे या रुई की कतरनों से सुसज्जित होता है । इनके चूज़े चौदह दिनों में बाहर आते हैं और कुछ ही हफ्तों में उड़ने लगते हैं। नर और मादा दोनों ही अंडे सेते हैं और चूजों को भोजन खिलाते हैं। ये एक प्रजनन ऋतु में एक से अधिक बार अंडे दे सकते हैं ।
अगर भोजन की बात करें तो ये फल, कुछ पौधों के पत्ते, फूल, कीड़े-मकौड़े कुछ भी खा लेते हैं। इन्हें घरों में मिलने वाली छिपकली भी खाते देखा गया है । कीड़ों में ये तितलियों को बड़े चाव से खाते हैं, इनकी उड़ान और पँखों की बनावट भी तितली से मिलती जुलतीं है । ये एक बार में लंबा न उड़कर छोटी छोटी उड़ान भरते हैं । इन्हें तितलियों के पीछे उड़ता देख मन सहम जाता है पर मैंने देखा है कि ज़्यादातर तितली बच निकलती है। एक बार तो तितली बुलबुल से बचती हुई घर के कमरे में दाखिल हो गई, हमने पँखा बंद कर उसका स्वागत किया । कुछ ही देर बाद वह अपनी सुरक्षा सुनिश्चित कर बाहर उड़ गई।
ये पक्षी भोजन की रुचि में बिल्कुल हरफ़नमौला हैं इसीलिए हर क्षेत्र में इन्हें भोजन प्राप्त हो जाता है । इस पर जिजीविषा ऐसी की कुछ ही सालों में इनकी अच्छी खासी तादाद बन जाती है। इन्हें फलों के बागानों में फलों का स्वाद लेते देखा गया है इसलिए ये इंसानों के लिए आक्रमणकारी पक्षियों में शीर्ष सौ पक्षियों में शुमार हैं। जंगलों को काटकर फलों के बागान बना दिये गए हों तो पक्षी फलों का स्वाद लेने क्यूँ नहीं आएंगे भला? इंसान समस्या की जड़ पक्षियों को समझता है जबकि समस्या खुद इंसान है।यह जानना भी ज़रूरी है कि गुलदुम बुलबुल कितने ही पेड़ों के परागन में मदद करती है, इनमें करौंदे का पेड़ प्रमुख है।
गुलदुम बुलबुल भारत के अधिकतम मैदानी क्षेत्रों में पाई जाती है । चित्रों को गौर से देखें और अपने आस पास नज़र दौड़ाएँ शायद आपको यह प्यारा पक्षी दिख जाए। या फिर कभी सुबह उठकर इनकी बांग से अपना दिन शुरू करें, यकीनन आपका दिन शुभ होगा क्योंकि आपने अपना दिन एक प्यारे पक्षी के प्रति प्रेम और संवेदना के साथ शुरू किया होगा।
संकल्प बक्षी
अगली कड़ियों में हम बात करेंगे गुलदुम बुलबुल जैसी ही एक अन्य बुलबुल के बारे में जिसे सिपाही बुलबुल भी कहा जाता है।

स्वागत नई पोस्ट का। बहुत सुंदर चित्र,आलेख जानकारियों से भरा हुआ है। प्रस्तुति और भाषा बांधे रखती है। नव वर्ष में और भी नए नए दिलचस्प आलेखों की प्रतीक्षा रहेगी। शुभकामनाएं। 👍👌💐
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