आज़ादी का सिपाही - सिपाही बुलबुल
आज़ादी का सिपाही - सिपाही बुलबुल
इसे संयोग ही कहेंगे कि पुणे में हमें एक ऐसे अपार्टमेंट में रहने का मौका मिला जिसके सामने एक बड़ा खाली प्लॉट था ।पुणे के औंध जैसे बसे बसाए और सुनियोजित तरीके से बने इलाके में खाली प्लॉट होना संयोग ही था।इस प्लॉट की मलकियत को लेकर कचहरी में मुकदमें चल रहे थे । इस पर हमारी खुशकिस्मती ही थी कि खाली प्लॉट के एक किनारे पर बड़े बड़े इमली और खेजड़ी के पेड़ थे जिनके पीछे से दूर पहाड़ी के दर्शन होते थे। इन पेड़ों पर सैंकड़ों पक्षियों के नीड बसेरे थे । हमारे फ़्लैट के सामने ही प्लॉट पर एक झाड़ीनुमा कांटेदार बेर का पेड़ था। सच मानिए ये छोटी चिड़ियाओं जैसे गौरैया आदि के लिए रक्षाकवचयुक्त किले से कम नहीं था । हमारा यह घर पक्षी अवलोकन के लिए सर्वोत्तम था।
बहरहाल लॉकडाउन काल के दौरान हमनें पक्षियों के लिए किचन की खिड़की के बाहर ही रोटी रखना शुरू किया। कुछ ही दिनों में हमारा पक्षी-रेस्टोरेंट आसपास के सभी पक्षियों में प्रसिद्ध हो गया। गौरैया, मैना, गुलदुम बुलबुल, ब्रह्माणी मैना और कबूतर रोटी बनने की राह देखते रहते और रोटी डालते ही एक एक करके रोटियाँ खाते। पर ये सभी तब ही आते जब हम रसोई की खिड़की से दूर चले जाते। कुछ दिनों बाद रोज़ की ही तरह हमने रोटी खिड़की के बाहर डाली, हम वहीं खड़े थे कि एक सुंदर सी चिड़िया खिड़की के जंगले के अंदर आकर रोटी खाने लगी - सर पर काली कलगी, गालों के दोनों ओर लाल धब्बे, सफेद और काले परों के साथ दुम के ऊपर लाल निशान वाली यह चिड़िया बहुत ही मनमोहक थी। उसे हमसे ज़रा भी डर नहीं लगा और वह मज़े के साथ रोटी खाने लगी । हम झट से पहचान गए कि यह एक प्रकार की अनोखी बुलबुल - सिपाही बुलबुल है। नर और मादा दोनों ने मन भर रोटी खाई और उधर हम दोनों हैरानी के साथ मन भरकर उन्हें देखते रहे। गौरैया और गुलदुम बुलबुल भी दूर से ही उन्हें रोटी खाता देखते रहे पर हमारे वहाँ खड़े रहने तक वे खिड़की पर आने की हिम्मत न जुटा पाए। हम जब तक मोबाईल से फोटो या वीडियो लेते वे दोनों सिपाही बुलबुल फुर्र से थोडी सी रोटी खाकर उड़ गईं। आप विश्वास नहीं करेंगे पर एक ही रोटी से इन सभी चिड़ियाओं का भोजन हो जाता था। कबूतर के अलावा सभी चिड़ियाएँ संयम के साथ दाना/खाना चुगती दिखाई देतीं थीं। संभवतः अपने बड़े आकार और बढ़ती जनसँख्या के कारण कबूतरों की प्रवत्ति भी इंसानों की तरह हो गई है, वे रोटी पर इस तरह झपटते की आधी से ज़्यादा नीचे गिर जाती, इस पर फिर कभी विस्तार से लिखा जाएगा।
सचमुच नाम के अनुरूप ही सिपाही बुलबुल हमें फौज के सिपाहियों की तरह ही साहसी लगी। जहाँ मैना और कबूतर जैसे आकर में बड़े पक्षी हमसे डरते थे वहीं निडर और सुंदर आवाज़ वाली यह चिड़िया हमारे इतने करीब आकर भी बेबाक और निर्भीक थी। बुलबुल प्रजाति की इस चिड़िया को सर पर कलगी होने के कारण सिपाही बुलबुल कहा जाता है, शायद कलगी पक्षी वैज्ञानिकों को सिपाहियों की पगड़ी या टोपी सरीखी प्रतीत होती रही होगी । सिपाही बुलबुल उत्तर से लेकर दक्षिण भारत में पाई जाती है । यह गुलदुम बुलबुल से कम संख्या में पाई जाती हैं और गुलदुम बुलबुल की ही तरह ये फल और कीड़े खाती हैं। जहाँ फूलों वाले पेड़ और झाड़ियाँ होंगी वहाँ इन पक्षियों को कीड़े आदि खूब मिलेंगे जो इन पक्षियों को आकर्षित करेंगे। इसलिए ये चिड़ियाएँ बागीचों, बागानों और इंसानी बस्तियों के आसपास की हरितिमायुक्त जगहों पर आती रहीं हैं।
आजादी के नायक - कवि राम प्रसाद 'बिस्मिल' ने सम्पूर्ण भारत में बहुतायत में पाई जाने वाली इस चिड़िया को बलिदान के प्रतीक के रूप में देखा था। उन्हें सिपाही बुलबुल के गले के आसपास के लाल निशान फांसी के फंदे से दिखाई देते थे। जनमानस में जोश भरने के लिए उन्होंने सिपाही बुलबुल का उल्लेख कर कई कविताएं और गज़लें लिखीं थीं । उनमें से कुछ जानी -मानी पंक्तियाँ कुछ इस तरह थीं:
" क्या हुआ गर मिट गए अपने वतन के वास्ते ।
बुलबुलें कुर्बान होती है चमन के वास्ते ।। "
आज़ादी के दीवाने कुछ अलग ही लोग थे, उनके बलिदान से ही आज हमारा वर्तमान जीवन सम्भव हुआ है। अफ़सोस है कि हिंदुस्तान की आज़ादी की कहानी में शामिल इस बुलबुल को इसके रूप रंग और मीठी बोली के कारण पिंजरों में कैद किया जाता रहा है। इंसान दूसरे इंसानों तक को वस्तु समझ कर उनसे मनमानी करता आया है तो बुलबुल तो एक पक्षी है। स्वछंद इंसानों के खिलखिलाते चहरे और स्वछंद पक्षियों की मदमस्त उड़ानों में ज़्यादा फर्क नहीं है, कभी इस नजरिए से चीजों को ज़रूर देखिएगा, शायद आप सभी में सिपाही बुलबुल जैसी हिम्मत आ जाए।
संकल्प बक्षी


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