पर्यावरण संरक्षण की राह हमारे ही घरों से
पर्यावरण संरक्षण की राह हमारे ही घरों से
विश्व पर्यावरण दिवस आने को है। इस दिन पर्यावरण संरक्षण से जुड़ी कई गतिविधियाँ और मुहिमें सुर्खियों में रहेंगी। हम सभी के मन में अनायास ही प्रकृति के प्रति प्रेम और आस्था जाग्रत होगी और हो भी क्यों न, हम सभी अपने पर्यावरण को स्वच्छ जो रखना चाहते हैं। पर यह जानना और समझना ज़रूरी है कि पर्यावरण हितैषी बनने की राह हम सभी के घरों और दफ्तरों से निकलती है कहीं और से नहीं।
आज विश्व की शीर्ष प्लास्टिक प्रदूषक कंपनियां हमारे बहुत ही करीब हैं । इनमें से कुछ नाम हैं कोका-कोला, पेप्सी, नेस्ले, यूनीलीवर, पी एंड जी आदि। जब मैं व्यवसाय प्रबंधन में स्नातकोत्तर (एम.बी.ए) कर रहा था तब इन्हीं कंपनियों में नौकरी पाने की अभिलाषा लगभग हर विद्यार्थी में थी, और हो भी क्यूँ न । अच्छी सैलरी, ज़मीनी स्तर पर प्रबंधन सीखने का मौका और ब्रांड वैल्यू सब कुछ मिल जाता था एक साथ । बहरहाल ये कंपनियां सिंगल यूज़ प्लास्टिक की सबसे बड़ी खरीददार और वितरक हैं ।
आप चित्र में एक साधारण सॉस या कैच अप का सैशे या पैकेट देख पा रहे होंगे । इस पर मैंने एक बड़ा सा गलत का चिन्ह बना दिया है क्योंकि यह छोटा सा पैकेट जो किसी भी बर्गर, सैंडविच या और किसी फास्टफूड के साथ मुफ्त दिया जाता है सिंगल यूज़ प्लास्टिक का बेजोड़ नमूना है। इस तरह के प्लास्टिक मल्टी लेयर होते हैं । अगर आप पैकेट को काटें तो कई बार एक अलग सी प्लास्टिक की परत भी नज़र आती है। इस सैशे या पैकेट को पूरी तरह नष्ट होने में 500 से 1000 साल तक लगते हैं । मल्टी लेयर होने के कारण इसे रिसाइकल नहीं किया जा सकता । इसे डाउन-साइकल किया जा सकता है, यानी किसी दूसरे पदार्थ में बदला जा सकता है जो किसी और काम में आ सके जैसे सड़क बनाने का टार बनाने में, पर पूरी तरह नष्ट नहीं किया जा सकता ।
इस पर अगर आप इसे खोलते समय इसका कोना काट कर अलग कर दें, तो फिर इसकी डाउन साइकिलिंग करना भी माउंट एवरेस्ट की चढ़ाई जितना कठिन है । यह छोटा सा कोना आसानी से कचरे के ढेर से गुम होता हुआ ज़मीन के भीतर या गटर से होता हुआ नदियों और वहाँ से समुंदर के गर्भ में पहुंच सकता है। यह सभी सिंगल यूज़ प्लास्टिक पेट्रोलियम और उसके उत्पादन के अपशिष्टों या सहउत्पादों से बनते हैं । थोड़ा और सोचें तो यह छोटी सी वस्तु प्रकृति पर दोहरी मार करती है , पहला यह कार्बन उत्सर्जन करने वाले फॉसिल पदार्थों से मिलती है, जब प्लास्टिक की माँग बढ़ती है तो पेट्रोलियम उत्पादन भी बढ़ता है और पेट्रोल के जलने से उत्पन्न कार्बन डाई ऑक्साइड से धरती का तापमान बढ़ता है और जलवायु परिवर्तन होता है। दूसरी मार यह कि ऐसे प्लास्टिक तत्व यदि लंबे समय तक मिट्टी में दबे रहे तो ये मिट्टी में कैडमियम,क्रोमियम और लेड जैसे घातक रसायनों का रिसाव करते हैं , इस मिट्टी से यह पदार्थ भूजल (ग्राउंड वाटर) तक पहुंच जाते हैं और वहाँ से इंसानों और पशु-पक्षियों के पेयजल तक पहुंच जाते हैं। यदि ये नदियों, तालाबों और समुद्रों में पंहुचे तो वहाँ के सभी जलचरों और जलीय पौधों के भीतर तक इनके प्लास्टिक कण और रसायन घर कर लेते हैं । ये रसायन भारी बीमारियों जैसे कैंसर के कारक होते हैं।
क्या इस मामूली सैशे से इतना बड़ा नुकसान हो सकता है? जी, बिल्कुल हो सकता है और हो रहा है। तो हमें क्या करना चाहिए, सैशे और पैकिटों की खरीदारी में कमी करनी चाहिए। कुछ उपाय जो हम सब कर सकते हैं:
1. यदि सैशे या प्लास्टिक पैकेट की जगह प्लास्टिक का ही कनस्तर या काँच की बोतल में वही सामान मिल रहा हो तो उसे प्राथमिकता दें । ये बोतलें और कनस्तर रिसाइकल हो सकते हैं।
2. ऐसी कंपनियों के उत्पादों को प्राथमिकता दें जो कागज़, कपड़ा, बांस और अन्य पर्यावरण हितैषी पैकिंग में अपने उत्पाद बेच रही हों।
3. कुछ पदार्थ जैसे दूध सिर्फ प्लास्टिक की थैली में ही उपलब्ध हैं । इन थैलियों को काटते समय कोने को अलग न करें । साथ ही इन्हें अलग से सूखे कचरे के साथ ही रखें।
4. प्लास्टिक पैकेट्स के अंदर गीला कचरा न रखें क्योंकि इससे ये गंदे हो जाते हैं और फिर इनकी डाउन साइकिलिंग में मुश्किल होती है।
5. अगर आप खाना बाहर से मंगवा रहे हैं तो रेस्टोरेंट को हिदायत दें कि सैशे और प्लास्टिक पैकेजों में खाना न भेजे। मसलन यह कैचअप का सैशे न मंगाए, अपने घर का कैचअप इस्तेमाल कर लें।
ऐसी और उपाय आप भी सोचें और अपने मित्रों से साझा ज़रूर करें। हम चाहें तो बड़ी से बड़ी कंपनी को पर्यावरण हितैषी बनने पर बाध्य कर सकते हैं, हम उपभोक्ता हैं यानी जनता । पर यह करने के लिए पर्यावरण संरक्षण की मुहिम हमें अपने ही घरों, मोहल्लों और दफ्तरों से शुरू करनी होगी। मैं खुद इन पर अमल करने का प्रण ले रहा हूँ, आप भी लें। सचेतन और स्वस्थ रहें।
संकल्प बक्षी



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