बारिश की बिन बुलाई मेहमान

 बारिश की बिन बुलाई मेहमान

आजकल बारिश का मौसम है । कभी तेज़ हवा के साथ थपेड़े, कभी झीनी-झीनी रिमझिम तो कभी बादलों में छुप कर उमस के रूप में बारिश अपनी उपस्थिति दर्ज कर रही है । इस मौसम की किसी दोपहर में जब कानों में भिनभिनाहट होती है तो लगता है कहीं ये वो तो नहीं, वो यानी मलेरिया/डेंगू वाला मच्छर तो नहीं । गौर से देखने पर समझ आता है कि ये वो नहीं बल्कि ये है - एक मक्खी । उमस से लबरेज़ बारिश के मौसम में अक्सर मक्खियाँ हमारी बिन बुलाई मेहमान बन जाती हैं । 



मन में प्रश्न उठता है कि ये कहाँ थी अब तक और अब क्यों आ गई । विकिपीडिया पर इसका जवाब है कि मक्खियाँ तकरीबन छह करोड़ साठ लाख सालों से पृथ्वी पर हैं और इनकी उत्पत्ति विश्व के मध्य पूर्व भाग से हुई । ये सर्दियों में भालुओं की तरह लंबी नींद में (हाइबरनेशन) में चली जाती हैं और फिर गर्मी और बारिश में सक्रिय होती हैं । मक्खियों पर अनन्तकाल से कितने ही कवियों और लेखकों ने रचनाएं लिखी हैं । इसी कान में भिनभिनाती मक्खी ने किसी को जीवन की नश्वरता तो किसी को मनमौजी और चपल होने की प्रेरणा दी है ।

वैज्ञानिकों के अनुसार मक्खियाँ विलक्षण जीव हैं । काला-भूरा शरीर और लाल आखों वाली घरेलू मक्खियों की संरचना इन्हें हरफनमौला बनाती है । इनके पास उड़ने के लिए एक जोड़ी पँख हैं, इनके छह पैरों में गोंदयुक्त पैड्स हैं जिनसे ये ज़मीन पर, छत पर, खड़ी दीवार पर यानि कहीं भी चिपक सकती हैं । पैरों के सिरों पर पँजे हैं जिनसे यह किसी भी सतह से खुद को अलग भी कर सकती हैं । 

मक्खियाँ कई बार चार पैरों पर बैठकर अगले दो पैरों को आपस में रगड़ती दिखती हैं । असल में इनके पैरों में स्वाद ग्रंथियाँ होती हैं जिनसे ये अलग-अलग सतहों पर बैठकर अपना पसंदीदा मीठा पदार्थ ढूंढती रहती हैं । बीच-बीच में अगली टांगो को आपस में रगड़कर साफ करती रहती हैं जिससे स्वाद का सही अंदाज़ लगता रहे और भोजन ढूंढने में आसानी हो । ये तरल पदार्थों का सेवन करती है और ठोस पदार्थों को अपनी लार से तरल बनाकर फिर उनका सेवन करती है । इनके मुंह में सुसज्जित नली नुमा ग्रंथि से ये पदार्थों को चूस कर अपना भोजन करती है । इंसानों के खाद्य पदार्थ, गीला कचरा और इंसान और जानवरों का मल इनका आहार है । 

मादा मक्खी नर से आकार में बड़ी होती है । मादा की आखों के बीच की दूरी नर के अनुपात में ज़्यादा होती है । मादा अपने जीवन काल में एक ही बार प्रजनन करती है, इसके बाद वह अपने जीवनकाल में 75-150 की खेप में 500 तक अंडे दे सकती है । ये सफेद अंडे किसी भी सड़े-गले खाध पदार्थ या मल में दिये जा सकते हैं, अंडो से इनके लार्वा एक ही दिन में निकल आते हैं जो कचरे को खाने लगते हैं,  ये जल्दी ही प्यूपा में बदल जाते हैं जो दो स्व तीन दिन में वयस्क मक्खी बन जाते हैं । मक्खियों का जीवन काल पंद्रह दिन से एक महीने तक का हो सकता है ।

आप सोच रहे होंगे कि इस छोटे से परेशान करने वाले जीव के बारे में इतनी जानकारी जुटाने का क्या औचित्य है । जीव कितना ही छोटा हो, वह अपने आकर से कई बड़े कार्य करने में सक्षम होता है । मक्खी अपनी लार से ठोस कचरे को तरल कचरे में बदलने में सक्षम हैं, इन्हें प्रयोगशाला में उत्पन्न करना आसान है और इसी कारण से ये मनुष्यों के कचरे को खाद में बदलने के उपक्रम में बेहद सहायक हैं । इनके लार्वा और प्यूपा जानवरों का आहार बन सकते हैं, इनमें प्रोटीन की काफी मात्रा होती है । 

पर मक्खी तो कई जीवाणुओं का घर है जैसे टी.बी., टायफॉइड, कोलेरा, हैजा आदि आदि । बेशक वयस्क मक्खियां हैं पर इनके लार्वा और प्यूपा नहीं । इसलिये मक्खियों से बचने और खाद्य पदार्थों को ढकने की हिदायत दी जाती रही है । इसमें मक्खियों का दोष नहीं है, इनका खानपान और जीवनशैली इन्हें जीवाणुओं का घर बना देती हैं । पर मनुष्य साफ सुथरा और जीवाणुओं से मुक्त होने के बाद भी कलुषित है । दूसरे विश्वयुद्ध में जापान ने प्रयोगशाला में करोड़ों मक्खियों का उत्पादन कर उन पर कॉलेरा के जीवाणुओं के छिड़काव करने के बाद चीन के कुछ शहरों पर उन्हें छोड़ दिया था । इस कुकृत्य से उन इलाकों में कॉलेरा महामारी की तरह फैल गया जिससे लाखों लोगों की जान गई ।

भले ही आप इनकी मेहमाननवाजी करें या इन्हें बाहर भागने के उपक्रम, सत्य तो यह है कि मक्खियाँ इंसानों से पहले भी पृथ्वी पर थीं,आज भी हैं और इंसानों के बाद भी यहाँ रहेंगी - अपनी छोटी-छोटी उड़ानों, भिनभिनाहट और निरंतर किसी न किसी सतह को परखने वाली जिजीविषा के साथ । 


संकल्प बक्षी

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