बँधुआ
बँधुआ
हमारे घर की खिड़की से बाहर अमलतास के पेड़ हैं जिनपर कभी बुलबुल, कबूतर तो कभी बगुलों का आना जाना लगा रहता है । सूर्यपक्षी, फुतकी और महोक भी अपने भोजन की तलाश इन पेड़ों के पीछे बने छोटे से उद्यान में अपनी दिनचर्या बिताते दिखते हैं । यदाकदा हरिमन तोतों का झुंड भी कहीं किसी पेड़ पर सुस्ता लेता है। यद्यपि इन सभी की आवाज़ें अपार्टमेंट कॉम्पलेक्स के बाशिंदों के शोरगुल में गुम हो जाती हैं, पर एक सचेतन मन वाला व्यक्ति इन्हें सुलभता से देख और सुन सकता है।
कभी कभी सन्नाटे में कुछ लव बर्ड्स के उड़ने और चहचहाने की आवाज़ें आती हैं । गौर से देखने पर।दिखाई देता है कि उद्यान के दूसरे छोर से लगी बिल्डिंग के एक फ्लैट की बालकनी में लव बर्ड्स, बालकनी नुमा पिंजरे के एक छोर से दूसरे छोर तक चक्कर लगा रही हैं । निश्चित ही मकान और इन पंछियो के स्वामी को ये आवाज़ें लुभाती होंगी ।
वे और उनके जैसे कई लोग अपने जीवन के सन्नाटे को दूर करने के लिये पक्षी जैसे स्वछंदता से उड़ने वाले जीव को कैद कर देते हैं । इन पक्षियों का क्रंदन और मजबूर आहें उन इंसानों का मनोरंजन करती हैं ।
ये पक्षी प्रेमी जन बहुत प्यार से रखते हैं इन पंछियों को, भरपूर भोजन, पिंजरे में ही उड़ने की व्यवस्था और हल्की सी भी चोट लगने पर तुरंत उपचार । और ये पक्षी भी अवसाद से ग्रस्त हो उस जीवन शैली को अपना लेते हैं, मजबूरी को ही जीवन की धारा समझ अपना जीवन जी कर मर जाते हैं ।फिर नए पक्षी ले आए जाते हैं ।
किसी भी स्वछंद प्राणी को बाड़े में कैद करना अक्षम्य अपराध है, चाहे वे कोई भी हों- पक्षी, मछली, अन्य जीव-जंतु और इंसान (जी हाँ इंसान भी दूसरे इंसानों को मजबूर कर अपना जीवन ठाठ से जीता आया है) ।
इस पोस्ट का अफ्रीकी जंगलों से भारत लाए गए चीतों से कोई संबंध नहीं है । अफ्रीका तो सदियों से बँधुआ मजदूरों के निर्यात का केंद्र रहा है, यहाँ तो सिर्फ चीतों की बात है और वहाँ के जंगल यहाँ के जंगलों से अलग थोड़ी हैं । और फिर उन चीतों का इतना ध्यान रखा जा रहा है, ढोल-नगाड़ों से उनका स्वागत किया गया है । इन नगाड़ों के शोर में भी उन चीतों की डरी-सहमी मिमियाहट गुम नहीं होती, वह मीडिया में दिखाई जाती है - चीते की 'दहाड़' शीर्षक के साथ । सबसे बड़ी बात यह कि ये आठ मर भी गए तो आठ और मंगवा लिए जांएगे, जैसे और पक्षी ले आए जाते हैं मनोरंजन के लिए।
संकल्प बक्षी
(चित्र गूगल से साभार)



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