प्रवासी पक्षी - 2: सफ़र की दिशा और पड़ाव
प्रवासी पक्षी - 2
सफ़र की दिशा और पड़ाव
आज से तकरीबन 350 वर्ष पूर्व पहले स्टीम चलित इंजन का आविष्कार हुआ, इसके बाद रेल और स्टीमर से लंबी दूरी का इंसानी सफर सुलभ हो गया । लगभग 120 साल पहले हवाई जहाज का आविष्कार हुआ जिसके बाद प्रवासी पक्षियों की तरह मनुष्य भी हवाई सफर करते हुए लंबी यात्राएं करने लगे । पक्षियों के प्रवास के उल्लेख ग्रीक दार्शनिकों और वैज्ञानिकों जैसे हेसोइड, होमर, अरस्तु और हिरोडोटस कि लेखनियों में मिलते हैं यानि लगभग 3000 साल पहले से ।
शायद इससे भी कई वर्षों पहले से ही पक्षी प्रवास पर जाते रहे हैं । क्रमागत उन्नति ने जहाँ इंसानों को चलने के लिए पाँव और अति विकसित दिमाग दिया वहीं पक्षियों को पर और स्वाभाविक प्रकृति (इंस्टिंक्टस) दिए। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि प्रवासी पक्षी सूर्य उगने की दिशा, हवा की दिशा और तापमान से यह समझ जाते हैं कि प्रवास पर जाने का समय आ गया है । हर वर्ष उसी निश्चित समय ये पक्षी प्रवास पर निकलते हैं । जलवायु परिवर्तन के कारण प्रकृति के मौसम चक्र पर पड़ा दुष्प्रभाव प्रवासी पक्षियों के प्रस्थान और आगमन के समय को भी प्रभावित करता है ।
प्राकृतिक संसाधनों की सहायता से ही प्रवासी पक्षियों का कठिन सफर संभव है । इन्हें अपनी मंज़िल का रास्ता सूर्य की दिशा, धरती के चुम्बकीय क्षेत्र और आसमान में तारों और नक्षत्रों की स्थिति के हिसाब से ज्ञात होता है । पीढ़ी दर पीढ़ी ये पक्षी वही मार्ग हर साल चुनते हैं । अगर आसमान में वायु प्रदूषण के कारण तारे न दिख रहे हों या बेमौसम तूफान से सूर्य आसमान से नदारद हो तो पक्षियों का सफर और कठिन हो जाता है । बड़े आकार के पक्षी जैसे बतखें, सारस और बाज आदि अमूमन दिन में उड़ान भरते हैं और रात को भोजन और विश्राम करते हैं । इसके विपरीत छोटे पक्षी जैसे टिट, थ्रश और फ्लाईकैचर प्रजाति के पक्षी रात को उड़ान भरना पसंद करते हैं क्योंकि रात को बड़े परभक्षियों का खतरा कम होता है ।
सफर की थकान मिटाने के लिये ये पक्षी अपने प्रवास मार्ग पर हर वर्ष कुछ चिन्हित स्थान विश्राम के लिए चुनते हैं । ये स्थान आर्द्रभूमि (वेट लैंड), जलाशय और हरियाली युक्त मैदान भी हो सकते हैं । ये वे स्थान हैं जहाँ भरपूर मात्रा में कीड़े, मछली,मेंढक और अन्य छोटे बड़े जीव भोजन के रूप में उपलब्ध होते हैं। उदाहरण स्वरूप आमुर बाज (आमुर फॉल्कन) एक छोटा सा बाज है जो साइबेरिया और उत्तरी चीन से भारत होते हुए दक्षिण और पूर्वी अफ्रीका में प्रवास करने पंहुचता है । ये बाज झुँड में सफर करते हैं, और भारत प्रवास के दौरान कीट-पतंगों की दावत उड़ाते हैं । अफ्रीका पहुँच कर ये टिड्डी दलों का सफाया भी करते हैं। प्रकृति इसी प्रकार खाद्य श्रृंखला का संतुलन बना कर रखती है ।
ज़रा सोचिए कि आमुर बाज भारत में रुकें और उन्हें हरियाली से भरे मैदानों की जगह सीमेंट और कंक्रीट के जंगल मिलें तो क्या होगा । ये बाज लंबी उड़ान के बाद थकान और भोजन के अभाव में दम तोड़ देंगे और शायद कुछ ही वर्षों में वे अपने रुकने का ठिकाना बदल लेंगे । इनके रस्ता बदलनें से शायद प्रकृति का असंतुलन और प्रकोप कीड़ों और पतंगों की बहुतायात के स्वरूप में दिखेगा । इसलिये धरती के प्राकृतिक संसाधनों को सहेजना बहुत ज़रूरी है ।
इस कड़ी में इतना ही, अगली कड़ी में एक ऐसे प्रवासी पक्षी के बारे में जानेंगे जिसका उल्लेख संस्कृत के महान कवि कालीदास ने भी किया था ।
(संलग्न चित्र विकिपीडिया से साभार)
क्रमशः
संकल्प बक्षी

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