भटटू
भटटू
पिताजी के कलकत्ता ट्रांसफर होने के बाद हम नए आवास में रहने गए, मैं कुछ 12-13 साल का रहा हूँगा। यह कलकत्ता के चेतला इलाके में एक अपार्टमेंट था जिसके पीछे की तरफ गोंद बनाने का कारखाना और सड़क के पार सामने की तरफ गाड़ियों के पुर्जे बनने का कारखाना था । कारखानों में सुबह और रात की पहरियों में काम होता था । समय सूचक के तौर पर हर पहर पर गिनती के हिसाब से घंटा बजाया जाता था, चाहे दिन हो या रात जो कि मुझे काफी अलग लगता था, किसी कारखाने के नज़दीक रहने का यह मेरा पहला अनुभव था ।
बचपन से ही पशु पक्षियों से मुझे बड़ा लगाव रहा है , कलकत्ते जैसे घनी आबादी वाले क्षेत्र में कौए बहुत दिखाई देते थे । यहाँ हम बालकॉनी में रोटी रखते और वहाँ कौए आकर वो रोटी उठा कर ले जाते । कौओं जैसे संगठित और निर्भीक पक्षी मैंने कम ही देखे हैं पर वे आपस में भी बहुत उलझते थे । हमारी सुबहें और शामें कौओं के शोर से गुलज़ार थीं । सड़क पर कुछ एक कुत्ते और बिल्लियाँ भी दिखते थे, मैं मन ही मन सोचता था कि काश इन में से किसी से मेरी दोस्ती हो जाए । ऐसी ही एक दोपहर को मैं अपनी रहवासी बिल्डिंग के दरवाज़े पर खड़ा था । मुझे लगा कि कोई मुझे देख रहा है, सामने की तरफ नज़र पड़ी तो एक भूरे रंग का कुत्ता मुझे देख रहा रहा था, उसकी आँखे लाल थीं जैसे लंबी नींद से उठा हो या सोया ही न हो और हावभाव ऐसे थे जैसे कोई दरोगा संदिग्धों को देखता है । उसकी कद काठी बंगाल और उत्तर पूर्वी भारत के अधिकांश स्थानीय कुत्तों की तरह थी - मध्यम कद, चौड़ा माथा, गठीला शरीर और छोटी सी पूँछ जो शायद काट दी गई थी । उस कुत्ते की हालत थोड़ी खराब लग रही थी, शरीर दुबला था और जननांग से एक काला लम्बा ट्यूमर नीचे लटक रहा था । आमतौर पर मैं कुत्तों को पुचकारकर उनसे दोस्ती करने में तनिक भी समय नहीं लगाता था पर उसे देखकर थोड़ा डर सा लगा, मैं पलटा और ऊपर घर की तरफ भाग गया ।
कुछ दिनों बाद तक वह मुझे कहीं नजर नहीं आया । फिर एक दोपहरी स्कूल से अवकाश के बाद मैं नीचे खड़ा था की सामने के कारखाने में काम करने वाले एक परिचित भैया दिखे । मैं उनसे पूछ बैठा की "वह भूरा कुत्ता जिसे ट्यूमर भी था, वह क्या मर गया?" । वे हँस कर बोले "कौन भट्टू? वो बिलकुल ठीक है, हम कारखाने के कुछ दोस्तोँ ने मिलकर उसका ऑपरेशन करवा दिया है। वह कारखाने में ही आराम कर रहा है और अब बेहतर है " । मुझे मन ही मन शांति मिली कि वह बेहतर है ।
अगले दिन मैं स्कूल की बस पकड़ने के लिए निकला तो भट्टू फिर कारखाने के बाहर से मुझे देख रहा था । अब वह स्वस्थ लग रहा था पर आँखों से अब भी अंगारे बरस रहे थे । उसी क्षण वह मेरी तरफ आया, उसकी चाल में लंगड़ापन था जो मुझे और भी डरा रहा था, मैं चलते-चलते सहम कर रूक गया । उसने मुझे सूंघा और देखता रहा, मेरी हिम्मत नहीं हुई कि मैं उसे पुचकारूं । तभी वहाँ कपड़े इस्त्री करने की दुकान के बाहर कोयले गर्म करते दादा ने कहा " बाबू ! भट्टू आपसे दोस्ती करना चाहता है। डरो मत, इसे आगे की दुकान पर से बिस्किट खिला दो" । सुनकर अचंभा हुआ कि भट्टू को कितना प्यार करते हैं इलाके के सभी लोग । मैं धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगा तो भट्टू भी मेरे साथ- साथ आने लगा और किराने की दुकान के पास रूक गया मानो उसका स्टॉप आ गया हो । मैं ठहरा और एक रुपये के पाँच छोटे-छोटे नानखटाई जैसे फीके बिस्किट खरीद कर उसके सामने रख दिए जो उसने तुरंत खा लिए ।
अब भट्टू से मेरी दोस्ती हो चुकी थी, वह मुझे देखता तो सीधे किराने की दुकान की तरफ बढ़ जाता । रोज़ एक रूपया खर्च करना मुश्किल था पर भट्टू यूँ भी उस जगह तक मुझे छोड़ने आता रहा ।
कलकत्ते में भटटू मेरा पहला मित्र था जो मुझे साहस देता रहा, विषमताओं से ऊपर उठकर जीवन का लुत्फ उठाने का ।
संकल्प


बहुत मार्मिक। और इस शुरुआती आत्मीय प्रेम की झलक हमें आज भी दिख ही जाया करती है। बहुत बधाई और शुभकामनाएं। लिखा भी बहुत अच्छा है आपने।
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