भीमबैठिका और रातापानी अभ्यारण्य की कुछ स्मृतियां

 भीमबैठिका और रातापानी अभ्यारण्य की कुछ स्मृतियां


सुबह के तकरीबन साढे सात बजे हमारी गाड़ी होशंगाबाद रोड पर दनदनाती हुई दौड़ रही थी, मंज़िल थी भोपाल से तकरीबन 40 किमी और होशंगाबाद हाइवे से 4 किमी भीतर स्थित भीमबैठिका या भीमबेटका की गुफ़ाएँ । सुबह का समय होने से सड़कें लगभग खाली थीं, कुछ सब्ज़ियों से लदे टेम्पो, ऑफिस जाने वाले बाइक सवार और कुछ स्कूली बसें आदि । भोपाल शहर से कुछ दस किमी बाहर आते ही सड़क के दोनों तरफ खेत दिखाई दिये जिनसे गेहूँ की फसल काटी जा चुकी थी, अब उनमें बस पीले ठूँठ नज़र आ रहे थे । खेतों का पीलापन मार्च की गर्मी को और बढ़ा रहा था । यकायक हमें हाइवे के समानांतर रेलवे ट्रैक पर एक सुपरफास्ट ट्रेन भागती दिखाई दी, भोपाल से गुजरने वाली यह रेल लाइन मध्य और पश्चिम भारत को दक्षिण भारत से जोड़ती है । भोपाल से इटारसी और इटारसी से विजयवाड़ा होते हुए ये चेन्नई, हैदराबाद और बेंगलूरू की तरफ जाती हैं। 


साइनबोर्ड के अनुसार हाइवे से महज 2 किमी दूरी पर सड़क के दाहिनी ओर हमारा गंतव्य था । हमने गाड़ी दाहिनी तरफ की सड़क पर मोड़ी की आगे रेलवे क्रोसिंग थी, किस्मत से क्रोसिंग खुली मिली और इसके आगे बढ़ते ही दो साइनबोर्ड दिखे जो यह इंगित कर रहे थे कि यहाँ से "रातापानी बाघ अभ्यारण्य" का वन क्षेत्र शुरू होता है और साथ ही भीमबैठिका कि गुफाएँ अब 1 किमी की दूरी पर हैं । क्रोसिंग के आगे बढ़ते ही दाहिनी तरफ मध्यप्रदेश पर्यटन निगम का होटल था जिसका दरवाज़ा उस समय यानी 8 बजे के आसपास बंद था । इसके बाद तकरीबन 500 मीटर की चढ़ाई वाली पतली सड़क थी, ऊपर चढ़ते हुए हाइवे और खेत पीछे छूटते जा रहे थे और सड़क के दोनों ओर छोटे-बड़े सागौन के पेड़ हमारा स्वागत कर रहे थे । 


कुछ आगे बढ़ने पर अभ्यारण्य के भीतर जाने के द्वार पर नाका बना हुआ था ।  इस समय हमारे अलावा वहाँ कोई और नहीं था, इसलिये हमने वहाँ के सुरक्षा कर्मी कम टिकट क्लर्क से कुछ बातें की । उन्होंने बताया कि यह टिकट भीमबैठिका का नहीं बल्कि अभ्यारण्य का है । हमने कुतहलवश पूछा की क्या इस चौकी के आसपास भी बड़े परभक्षी जैसे तेंदुए और बाघ आते हैं । उन्होंने बताया कि वे इस जगह पर काफी आते हैं पर देर रात को या तड़के सुबह और कुछ दिन पहले ही इस नाके से थोड़ी ही दूरी पर एक नर तेंदुआ रेल लाइन पर करते समय रेल से टकराकर गुज़र गया था । कुछ साल पहले इसी जगह के आसपास तीन बाघ भी इसी तरह दुर्घटनाग्रस्त हुए थे । अभी कुछ ही मिनट पहले हाइवे पर हम एक तेज़ रफ़्तार ट्रेन के साथ अपनी गाड़ी की रफ्तार नाप रहे थे, वैसी ही ट्रेनों ने इस स्थान पर कितने ही निरीह जीव जंतुओं की जान ली होगी, यह सोचकर मन दुःखी हुआ । मुझे अपने स्कूल और कॉलेज के दिन याद हो आए जब सुपरफास्ट गाड़ियों जैसे राजधानी, शताब्दी और दिल्ली से चेन्नई को जोड़ने वाली भोपाल से होकर जाती तमिलनाडू एक्सप्रेस से सफर करना एक विशेषाधिकार सा माना जाता था । इन ट्रेनों में सफर करते समय ऐसा लगता था मानो समय के पंख लग गए हों, भारतीय रेल की तकनीकी विलक्षणता पर गुमान होता था । गुमान अब भी है, पर जंगलों से गुजरती पटरियों को लाँघने के लिये भूमिगत सुरंगों या ओवरब्रिज का अभाव उस गुमान को टीस में बदल देता है । जब हम इन ट्रेनों में रात को चादर ओढ़े सो रहे होते हैं तब न जाने कितने जंगली जानवर अपनी जान हथेली पर रखकर इन ट्रेनों के सामने से पटरियाँ लाँघ रहे होते हैं और दुर्घटनाग्रस्त हो रहे होते हैं । हम तकनीकी विकास का लुत्फ उठाते हैं पर उसकी असली कीमत ये जीव जंतु चुका रहे होते हैं । शायद वनवासी जीवों के आवागमन के रास्तों को चिंहित कर उन पर सुरंग बनाना, आधुनिकतम ट्रेनों के विकास से ज़्यादा पेचीदा और महँगा सौदा है ।  


इन्हीं ख्यालों में खोए जब हम नाके से आगे बढ़े तो जँगल कुछ और घना होता हुआ दिखा । इस वर्ष मार्च अंत तक ही भीषण गर्मी के कारण ज़्यादातर पेड़ सूखे और पीले पत्तों की वेश धारण किये हुए थे । ये पर्णपाती या पतझड़ी वन हैं जिनके अधिकांश पेड़ पतझड़ में अपने पत्ते गिरा देते हैं ।  वनरक्षक हमें बता चुके थे कि सुबह से शाम तक इस तरफ जंगली जीव जंतु नहीं आते, वे जंगल के भीतर और घने और छायादार स्थानों पर आराम कर रहे होते हैं । फिर भी मन में किसी जंगली जानवर को देखने का भय और उत्सुकता का मिश्रण सा चल रहा था । वैसे रातापानी अभ्यारण्य के इस जंगल में छोटे और बड़े मांसाहारी और शाकाहारी जीव, सरिसृप और कई तरह के पक्षी हैं जिनमें स्तनधारियों में तेंदुआ, बाघ, काला भालू, सियार, लोमड़ी, जंगली कुत्ते, साम्भर, चीतल, भौंकने वाले हिरन, स्याही, गौर, नील गाय, काले मुँह वाले लंगूर, लाल मुँह वाले बंदर आदि, सरिसृपों में कोबरा, करैत, वाइपर, अजगर, गिरगिट, कई प्रकार की छिपकलियां आदि और पक्षियों में धनेश, बुलबुल, किंगफिशर, महोक, डोम कौआ, जंगली और ब्राह्मणी मैनाएँ, कई प्रकार के तोते, कबूतर आदि शामिल हैं । 


कुछ आगे बढ़ते ही हमें मोर के झुंड सड़क पर करते दिखे, हमने अपनी गाड़ी रोक दी ताकि वे आराम से अपने रास्ते जा सकें । झुंड में नर और मादाएं दोनों शामिल थे, उनकी चाल में एक जल्दबाज़ी थी जो शायद हमारी मौजूदगी की वजह से थी । उनके रास्ता पार कर लेने के बाद हमने गाड़ी आगे बढ़ाई तो और एक झुंड सड़क पार करता दिखा, उनमें से एक मोरनी गाड़ी की आवाज़ से कुछ ज़्यादा ही डर गई और काफी दूर तक दौड़ लगाती रही । हमें बिन बुलाए महमानों सा महसूस हुआ । ये वन उन मोरों का और उन सभी जानवरों का घर है, हम मेहमान ही तो हैं । 


सड़क से अब ऊपर की ओर बढ़ते हुए हम भीमबेटका के द्वार तक पँहुच गए थे । वहाँ हमें और एक वनरक्षक मिले जिन्होंने हमें रुकने का इशारा किया और कार को सही जगह लगाने का निर्देश दिया । वे हमारे साथ-साथ काले मुँह के लंगूरों से भी मुखातिब हो रहे थे व उन्हें तेज़ आवाज़ में वहाँ से जाने को कह रहे थे । मेरी समझ से उन लंगूरों को हम सभी में कोई रूचि नहीं थी, वे मोरों की तरह ही जँगल के एक छोर से दूसरे छोर तक जा रहे थे । शायद उनका गंतव्य जंगल का वह छोर था जो भीमबैठिका गुफाओं के पीछे की तरफ था। जंगल में सूर्य की स्थिति के अनुसार धूप-छाँव का खेल चलता है और शायद यही पशु-पक्षियों को यहाँ से वहाँ जाने को प्रेरित करता है । ये जीव गर्मियों में धूप से बचकर भोजन और जल की तलाश में निकल पड़े थे। इस झुंड़ में सभी उम्र के लँगूर थे - बच्चे, युवा, बुजुर्ग, नवजातों के साथ मादाएँ और अंत में उनका मुखिया बड़े डील-डौल वाला नर चल रहा था । राजस्थान में हमारे पैतृक निवास पर कई बार काले मूँह वाले लँगूरों का आना होता था, वे छत पर उछल-कूद मचाते और मौका मिलने पर खाने पीने की चीजें उठा लेते । उनके मुखिया को हम "भौंकी" कहते थे और उससे दूर रहने की हिदायत दी जाती थी । रातापानी के इन लँगूरों का स्वभाव इंसानी बस्तियों के आसपास मिलने वाले उन लँगूरों से भिन्न था, ये हमसे आँखे नहीं मिला रहे थे और ना ही हमारे हाथ में रखी चीजों को लालच की नज़रों से देख रहे थे । हमारे पास उन्हें देने के लिए ऐसा कुछ भी नहीं था जो उन्हें जंगल से न मिल पाता हो । भीमबैठिका गुफाओं की दीवारों पर भित्ति चित्र बनाने वाले हमारे पुरखों की तरह ही वे भी चौकन्ने, फुर्तीले और अपने समूह की सुरक्षा में संतुष्ट नज़र आए ।


भीमबैठिका गुफाओं के समूह की खोज सन 1956-1957 में प्रख्यात पुरातत्वविद डॉ विष्णु श्रीधर वाकणकर ने की थी । यह संयुक्त राष्ट्र द्वारा विश्व धरोहर के रूप में चिन्हित है और हो भी क्यूं न इन गुफाओं की दीवारों पर उकेरे शैलचित्रों से 10,000 साल ईसा पूर्व से शुरू होकर विभिन्न कालों के आदि मानवों की जीवनशैली की कुछ झलकियाँ मिलती हैं । इन गुफाओं से करीब से रूबरू होने पर यह सोचने में आता है कि हज़ारों साल पहले घने जँगल में इन गुफ़ाओं में हमारे पुरखे किस तरह रहा करते थे और उनमें से कुछ अपनी आँखों देखी को अपने घर की दीवारों पर उकेरा करते थे - क्या कोई नन्हा कलाकार अपने बुजुर्गों से सुनी कहानियों की कल्पना कर वह चित्र बनाता था या समूह का कोई आधिकारिक इतिहासकार रोज़ की घटनाओं के दस्तावेज़ उकेरता था - इन सवालों के जवाब अब तक नहीं हैं । पर ये चित्र भीमबैठिका गुफाओं को इतने सालों बाद भी जीवंत बनाते हैं  - कहीं शिकार करने का दृश्य है, कहीं लावलश्कर के साथ जाती सेना या फिर दूल्हे की बारात तो कहीं उस काल के सभी जानवरों के चित्र हैं । सालों पुरानी यह कला सचमुच ऐतेहासिक धरोहर है और दर्शनीय है ।


भीमबैठिका गुफ़ाओं पर गूगल पर काफी जानकारी मौजूद है पर इन्हें प्रत्यक्ष रूप से देखना एक अलग अनुभव है । अपने पूर्वजों से मिलकर आने के बाद अब भी उन चित्रों की, उस जंगल की, उन मोरों और लँगूरों की और इस पुरातन स्थल की निगरानी करते आधुनिक काल के युवा सुरक्षाकर्मियों की स्मृतियां मन में कौंध रही हैं - तेज़ रफ़्तार हाइवे, रेलवे लाइन, दूर तक फैले हुए खेत और उनके मुहाने पर सघन वन की चादर में छुपी ये गुफाएँ ।


 संकल्प बक्षी









टिप्पणियाँ

  1. बहुत सुंदर और तथ्यपरक चित्रण। चित्र भी बहुत सुंदर। कुछ वर्ष पूर्व मैंने भी यहां थोड़ा सा समय गुजारा था, गुफाओं और प्राकृतिक सौंदर्य का अवलोकन किया था। आपने स्मृतियों को ताजा कर दिया। शुभकामनाएं।

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